हिमाचल: नेपाल और तिब्बत सीमा क्षेत्र में ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) से हुई तबाही के बाद हिमाचल प्रदेश में ग्लेशियल झीलों को लेकर सतर्कता बढ़ गई है। जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालयी क्षेत्रों में कई ग्लेशियल झीलों का आकार बढ़ रहा है, जिससे अचानक बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है।
हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति और किन्नौर जिले इस जोखिम को लेकर विशेष रूप से संवेदनशील माने जा रहे हैं।
सांगला झील का बढ़ता दायरा
किन्नौर की सांगला झील को लेकर चिंता बढ़ी है। उपलब्ध अध्ययन के अनुसार इसका क्षेत्रफल करीब 15.73 हेक्टेयर तक पहुंच चुका है और इसमें 15.27 लाख क्यूबिक मीटर से अधिक पानी जमा होने का अनुमान है।
यदि झील का प्राकृतिक बांध टूटता है और GLOF जैसी स्थिति बनती है, तो बसपा नदी घाटी में बाढ़ का गंभीर खतरा पैदा हो सकता है। इससे आसपास के गांवों और जलविद्युत परियोजनाओं पर भी असर पड़ने की आशंका है।
घेपन घाट झील भी संवेदनशील
लाहौल-स्पीति की घेपन घाट झील भी राज्य की संवेदनशील ग्लेशियल झीलों में शामिल है। यह चिनाब नदी बेसिन में स्थित है।
रिपोर्ट के अनुसार, 1989 के बाद से इस झील के आकार में करीब 178 फीसदी तक वृद्धि हुई है। वहीं, कुल्लू की वासुकी झील के जलस्तर में भी बदलाव को लेकर निगरानी बढ़ाई जा रही है।
सतलुज बेसिन में 2,292 ग्लेशियल झीलें
HIMCOSTE के अध्ययन के मुताबिक, अकेले सतलुज बेसिन में करीब 2,292 ग्लेशियल झीलें मौजूद हैं। इनमें से 1,335 झीलें तिब्बत क्षेत्र में स्थित बताई गई हैं।
तिब्बत क्षेत्र में स्थित झीलों को लेकर अतिरिक्त चिंता इसलिए है क्योंकि उन पर भारत का सीधा नियंत्रण नहीं है। वर्ष 2000 में सतलुज नदी में आई विनाशकारी बाढ़ के पीछे भी तिब्बत क्षेत्र की एक झील से जुड़ी घटना को ट्रिगर के तौर पर बताया जाता है।
300 मीटर तक का क्षेत्र रिस्क जोन मेंग्लेशियल झीलों से संभावित खतरे को देखते हुए राज्य सरकार और हिमाचल प्रदेश राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (HPSDMA) ने निगरानी और तैयारी बढ़ाई है।
इसके तहत संवेदनशील इलाकों में कई कदम उठाए जा रहे हैं:
अर्ली वार्निंग सिस्टम: C-DAC की मदद से संवेदनशील ग्लेशियल झीलों के आसपास रियल-टाइम चेतावनी प्रणाली विकसित और स्थापित की जा रही है।फ्लड जोनेशन: नदियों के किनारे 300 मीटर तक के क्षेत्र का रिस्क मैप तैयार किया जा रहा है और उसे रेड, येलो तथा ग्रीन जोन में बांटने की योजना पर काम किया जा रहा है।
सैटेलाइट मॉनिटरिंग: रिमोट सेंसिंग और सैटेलाइट तकनीक के जरिए ग्लेशियल झीलों के जलस्तर और उनके आकार में होने वाले बदलावों पर निगरानी रखी जा रही है।
जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई चुनौती
विशेषज्ञों के अनुसार, हिमालयी क्षेत्रों में तापमान बढ़ने से ग्लेशियरों और उनसे जुड़ी झीलों में बदलाव हो रहा है। ऐसे में ग्लेशियल झीलों की लगातार निगरानी और समय रहते चेतावनी जारी करना बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।
नेपाल में हालिया आपदा के बाद हिमाचल प्रदेश में भी संभावित GLOF को लेकर तैयारियों पर ध्यान बढ़ा है। समय रहते जोखिम वाले क्षेत्रों की पहचान, अर्ली वार्निंग सिस्टम और आपदा प्रबंधन की मजबूत व्यवस्था बड़े नुकसान को रोकने में अहम भूमिका निभा सकती है।
