दिल्ली देश की राजधानी है—वह शहर, जहाँ से पूरे भारत के लिए कानून, नीति और सुरक्षा की दिशा तय होती है। लेकिन जब इसी दिल्ली में महज़ 15 दिनों में 807 लोग गायब हो जाएँ, और उनमें सबसे ज़्यादा संख्या महिलाओं और बच्चों की हो, तो यह केवल एक आँकड़ा नहीं रहता, बल्कि पूरे सिस्टम पर एक डरावना सवाल बनकर खड़ा हो जाता है। यह स्थिति सामान्य तो बिल्कुल नहीं कही जा सकती—यह सीधे-सीधे प्रशासनिक विफलता और सामाजिक असुरक्षा की चेतावनी है।
सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि किसी भी शहर की सुरक्षा केवल पुलिस की संख्या या सीसीटीवी कैमरों से तय नहीं होती। सुरक्षा एक समग्र व्यवस्था है—जिसमें पुलिस की सक्रियता, खुफिया तंत्र की मजबूती, सामाजिक निगरानी, त्वरित न्याय और राजनीतिक जवाबदेही शामिल होती है। दिल्ली में इन सभी स्तरों पर संसाधनों की कमी नहीं है। केंद्र सरकार, गृह मंत्रालय, दिल्ली पुलिस—सब कुछ BJP के नियंत्रण में होने के बावजूद अगर हालात इतने भयावह हैं, तो सवाल उठना लाज़मी है कि चूक कहाँ हो रही है।
महिलाओं और बच्चों का बड़ी संख्या में गायब होना सबसे ज़्यादा चिंताजनक है। यह केवल अपराध नहीं, बल्कि मानव तस्करी, संगठित गिरोहों और सामाजिक असमानताओं की ओर इशारा करता है। क्या दिल्ली पुलिस ऐसे मामलों में संवेदनशीलता और तत्परता दिखा रही है? अक्सर देखा गया है कि गुमशुदगी की शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया जाता, शुरुआती घंटों में ढिलाई बरती जाती है—जबकि यही समय सबसे निर्णायक होता है।
राजनीतिक स्तर पर भी एक अजीब चुप्पी देखने को मिलती है। सुरक्षा जैसे मुद्दे पर बयानबाज़ी तो होती है, लेकिन ज़मीनी सुधार कम दिखाई देते हैं। अगर राजधानी ही सुरक्षित नहीं है, तो “विश्वगुरु” बनने के दावों का क्या अर्थ रह जाता है? सत्ता में होने का मतलब केवल श्रेय लेना नहीं, बल्कि जवाबदेही निभाना भी होता है।
एक और बड़ा कारण है—तेज़ी से बढ़ती आबादी और सामाजिक असमानता। झुग्गी-झोपड़ियों, प्रवासी मज़दूरों और हाशिए पर खड़े समुदायों की अनदेखी अपराध को पनपने का मौका देती है। जब लोगों को रोजगार, शिक्षा और सुरक्षा नहीं मिलती, तो वे या तो अपराध के शिकार बनते हैं या अपराध के जाल में फँस जाते हैं।
दिल्ली को सुरक्षित बनाने के लिए केवल सख्त कानून नहीं, बल्कि ईमानदार अमल चाहिए। पुलिस सुधार, जवाबदेह प्रशासन, तेज़ न्याय प्रक्रिया और समाज की भागीदारी—इन सबके बिना हालात नहीं बदलेंगे। वरना 807 लोग सिर्फ एक संख्या बनकर रह जाएँगे, और डर धीरे-धीरे हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन जाएगा।
आज सवाल यह नहीं है कि दिल्ली असुरक्षित क्यों है—सवाल यह है कि इसे सुरक्षित बनाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति कहाँ है?
