अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के उस बयान ने एक बार फिर भारत–अमेरिका व्यापार संबंधों को चर्चा के केंद्र में ला दिया, जिसमें उन्होंने दावा किया कि भारत ने अमेरिकी उत्पादों पर “ज़ीरो टैरिफ” यानी शून्य शुल्क लगाने पर सहमति जताई है। यह दावा जितना सीधा और प्रभावशाली सुनाई देता है, उसके बाद जारी हुई व्हाइट हाउस की फैक्टशीट उतनी ही संतुलित और सावधानीपूर्वक लिखी हुई नजर आती है। फैक्टशीट पढ़ने पर यह साफ होता है कि दोनों के बीच एक स्पष्ट अंतर है—राजनीतिक बयानबाज़ी और आधिकारिक नीति दस्तावेज़ का अंतर।
व्हाइट हाउस की फैक्टशीट में कहीं भी “ज़ीरो टैरिफ” शब्द का सीधे तौर पर इस्तेमाल नहीं किया गया है। इसके बजाय इसमें “टैरिफ में कटौती”, “चयनित क्षेत्रों में बाज़ार तक बेहतर पहुंच” और “आपसी सहमति से शुल्क में बदलाव” जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है। यह भाषा खुद संकेत देती है कि भारत–अमेरिका व्यापार समझौता किसी व्यापक मुक्त व्यापार समझौते (Free Trade Agreement) जैसा नहीं है, बल्कि सीमित और चरणबद्ध रियायतों पर आधारित है।
फैक्टशीट के अनुसार, दोनों देशों ने कुछ ऐसे क्षेत्रों की पहचान की है जहां लंबे समय से व्यापार विवाद या असंतुलन की स्थिति बनी हुई थी। इनमें कृषि उत्पाद, कुछ औद्योगिक सामान, और विशेष रूप से मेडिकल व टेक्नोलॉजी से जुड़े उत्पाद शामिल बताए गए हैं। इन क्षेत्रों में भारत ने कुछ शुल्क कम करने या सरल करने पर सहमति जताई है, जबकि बदले में अमेरिका ने भी भारतीय निर्यात के लिए कुछ बाधाओं को कम करने और व्यापारिक सहूलियतें देने की बात कही है।
यहां यह समझना जरूरी है कि भारत की टैरिफ नीति केवल राजस्व का साधन नहीं है, बल्कि वह घरेलू उद्योगों की सुरक्षा और विकास से भी जुड़ी हुई है। इसी कारण भारत आमतौर पर व्यापक स्तर पर टैरिफ हटाने से बचता रहा है। फैक्टशीट में इस संवेदनशीलता की झलक मिलती है। दस्तावेज़ में यह संकेत दिया गया है कि भारत की विकासशील अर्थव्यवस्था की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए ही किसी भी तरह की रियायतें तय की गई हैं।
फैक्टशीट का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि इसमें केवल टैरिफ पर ही नहीं, बल्कि नॉन-टैरिफ बैरियर्स यानी गैर-शुल्क बाधाओं पर भी जोर दिया गया है। इसमें कस्टम प्रक्रियाओं को सरल बनाने, मानकों और प्रमाणन से जुड़ी दिक्कतों को कम करने, और नियामकीय पारदर्शिता बढ़ाने जैसे मुद्दों का उल्लेख है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि व्यवहार में ये नॉन-टैरिफ बाधाएं कई बार टैरिफ से भी ज्यादा व्यापार को प्रभावित करती हैं।
डोनाल्ड ट्रंप के “ज़ीरो टैरिफ” बयान को यदि राजनीतिक संदर्भ में देखा जाए, तो यह घरेलू अमेरिकी दर्शकों के लिए एक मजबूत संदेश की तरह है। यह दिखाने की कोशिश कि अमेरिका ने एक बड़े बाजार से बड़ी रियायत हासिल की है। वहीं, व्हाइट हाउस की फैक्टशीट का उद्देश्य अलग है। यह दस्तावेज़ उद्योग जगत, नीति निर्माताओं और अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के लिए है, जहां सटीकता और संतुलन ज्यादा मायने रखते हैं।
फैक्टशीट में रणनीतिक संदर्भ भी बार-बार सामने आता है। इसमें कहा गया है कि भारत और अमेरिका केवल व्यापारिक साझेदार नहीं हैं, बल्कि रणनीतिक सहयोगी भी हैं। सप्लाई चेन की मजबूती, भरोसेमंद साझेदारी और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच सहयोग जैसे शब्द इस बात की ओर इशारा करते हैं कि यह समझौता केवल आर्थिक नहीं, बल्कि भू-राजनीतिक सोच का भी हिस्सा है।
एक और अहम बिंदु यह है कि फैक्टशीट में किसी भी फैसले को अंतिम रूप देने के बजाय समीक्षा और संवाद की बात की गई है। यानी टैरिफ में बदलाव स्थायी नहीं हैं, बल्कि समय-समय पर उनकी समीक्षा होगी। इससे यह संकेत मिलता है कि दोनों देश भविष्य में परिस्थितियों के अनुसार समझौते में बदलाव की गुंजाइश खुली रखना चाहते हैं।
व्यापार विशेषज्ञों के अनुसार, ट्रंप का बयान और फैक्टशीट एक-दूसरे के विरोधाभासी नहीं हैं, बल्कि अलग-अलग स्तरों पर बात करते हैं। बयान दिशा बताता है—कम शुल्क की ओर बढ़ने की दिशा—जबकि फैक्टशीट उस दिशा में चलने का व्यावहारिक नक्शा पेश करती है।
अंततः, व्हाइट हाउस की फैक्टशीट यह स्पष्ट करती है कि भारत–अमेरिका व्यापार संबंधों में कोई अचानक क्रांतिकारी बदलाव नहीं हुआ है। यह एक क्रमिक, सोचा-समझा और सीमित समझौता है, जिसका मकसद भरोसा बढ़ाना और आगे की बातचीत के लिए आधार तैयार करना है। “ज़ीरो टैरिफ” भले ही एक आकर्षक नारा हो, लेकिन वास्तविकता कहीं अधिक जटिल और संतुलित है।
