अमेरिका ने भारत को एक ऐसे वैश्विक “शैडो ट्रांसशिपमेंट नेटवर्क” का हिस्सा बताया है, जिसके जरिए चीन से जुड़े सामानों को दूसरे देशों के रास्ते अमेरिकी बाजार तक पहुंचाकर ट्रंप प्रशासन के भारी टैरिफ से बचने की कोशिश किए जाने का आरोप लगाया गया है। व्हाइट हाउस की रिपोर्ट The Great Transshipment Scam में भारत समेत 40 से अधिक देशों को संभावित ट्रांसशिपमेंट जोखिम वाले देशों के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका द्वारा 2018 में चीन के उत्पादों पर Section 301 के तहत टैरिफ लगाए जाने के बाद वैश्विक व्यापार मार्गों में बदलाव देखने को मिला। अमेरिकी प्रशासन का दावा है कि चीन से सीधे अमेरिका भेजे जाने वाले कई उत्पादों पर भारी शुल्क लगने के कारण कुछ कंपनियों ने तीसरे देशों के जरिए सामान भेजने के रास्ते तलाशने शुरू किए।
ट्रांसशिपमेंट का मतलब सामान्य तौर पर किसी सामान को उसके अंतिम बाजार तक पहुंचाने से पहले किसी तीसरे देश के रास्ते भेजना होता है। यह प्रक्रिया अपने आप में गैरकानूनी नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब किसी उत्पाद की वास्तविक उत्पत्ति छिपाने या टैरिफ से बचने के लिए केवल मामूली प्रोसेसिंग, पैकेजिंग, असेंबली या लेबल बदलने जैसी गतिविधियां की जाएं।
व्हाइट हाउस का आरोप है कि चीन से आने वाले कुछ उत्पाद भारत, मैक्सिको, वियतनाम और अन्य देशों के रास्ते अमेरिका पहुंच सकते हैं। रिपोर्ट में भारत को Tier 1 श्रेणी में रखा गया है। इस श्रेणी में बड़े व्यापारिक और औद्योगिक केंद्रों वाले देश शामिल हैं।
हालांकि, भारत का नाम रिपोर्ट में आने का अर्थ यह नहीं है कि भारत सरकार या हर भारतीय कंपनी पर अवैध गतिविधि का आरोप लगाया गया है। भारत एक बड़ा विनिर्माण और निर्यात केंद्र है और उसकी सप्लाई चेन में चीन समेत दुनिया के कई देशों से आने वाले कच्चे माल और कंपोनेंट शामिल होते हैं।
रिपोर्ट में अमेरिका ने दावा किया है कि 2025 में चीन से जुड़े करीब 67 अरब डॉलर के सामान भारत, मैक्सिको और वियतनाम जैसे प्रमुख हब के जरिए अमेरिकी बाजार तक पहुंच सकते हैं। अमेरिकी प्रशासन के अनुमान के मुताबिक, इससे लगभग 28 अरब डॉलर के संभावित टैरिफ राजस्व का नुकसान हुआ हो सकता है।
अमेरिका अब इस तरह के मामलों की पहचान के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल करने की योजना भी बना रहा है। व्हाइट हाउस ने “Detective Border” नामक AI सिस्टम का प्रस्ताव रखा है, जो कंपनियों की उत्पादन क्षमता, शिपिंग रूट, व्यापार दस्तावेज और सप्लाई चेन से जुड़े आंकड़ों का विश्लेषण कर संदिग्ध पैटर्न तलाश सकता है।
इसका सीधा असर भारतीय निर्यातकों पर पड़ सकता है। अमेरिका को सामान भेजने वाली भारतीय कंपनियों को यह साबित करने के लिए ज्यादा विस्तृत रिकॉर्ड रखने पड़ सकते हैं कि उनके उत्पाद वास्तव में भारत में बनाए गए हैं और उनमें पर्याप्त घरेलू वैल्यू एडिशन हुआ है।
भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक रिश्ते पहले से ही महत्वपूर्ण दौर में हैं। ऐसे में अमेरिकी रिपोर्ट का यह आरोप दोनों देशों के बीच व्यापार वार्ता को और जटिल बना सकता है।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अमेरिकी रिपोर्ट ने वैश्विक सप्लाई चेन पर अपना फोकस बढ़ा दिया है। अब अमेरिका केवल चीन से सीधे आने वाले सामान की जांच नहीं करना चाहता, बल्कि यह भी देखना चाहता है कि चीन से जुड़े उत्पाद किन देशों से होकर अमेरिकी बाजार तक पहुंच रहे हैं।
