नई दिल्ली: हर रिश्ते में छोटी-मोटी नोकझोंक होना आम बात है। लेकिन कई बार किसी गंभीर मुद्दे की वजह से नहीं, बल्कि रोजमर्रा की छोटी-छोटी बातों को लेकर कपल्स के बीच बहस होने लगती है। ऐसी ही एक आम समस्या है- ‘आज खाने में क्या बनेगा?’
किसी पार्टनर को घर का बना हल्का और हेल्दी खाना पसंद होता है तो दूसरे का मन बाहर से खाना मंगाने का होता है। किसी को शाम में जल्दी भूख लगती है, जबकि दूसरा देर रात खाना पसंद करता है। खाने की पसंद और समय को लेकर होने वाली इसी तरह की रोजाना की बहस से बचने के लिए कुछ कपल्स अब ‘फूड डिवोर्स’ का तरीका अपना रहे हैं।
क्या है ‘फूड डिवोर्स’?
नाम सुनकर ऐसा लग सकता है कि ‘फूड डिवोर्स’ का मतलब रिश्ते से अलग होना है, लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है। इसमें कपल एक-दूसरे से अलग नहीं होते, बल्कि सिर्फ खाने को लेकर अपनी पसंद और फैसले अलग रखने पर सहमत होते हैं।
यानी अगर दोनों की खाने की पसंद अलग है तो हर दिन एक ही डिश पर सहमत होने की जरूरत नहीं। दोनों अपनी पसंद का खाना बना या ऑर्डर कर सकते हैं और चाहें तो अलग-अलग समय पर खाना भी खा सकते हैं।
जब एक को रोटी-सब्जी तो दूसरे को नूडल्स पसंद हों
मान लीजिए एक पार्टनर को रोटी और सब्जी पसंद है, जबकि दूसरे का मन नूडल्स खाने का है। ऐसे में किसी एक को अपनी पसंद छोड़कर दूसरे की पसंद के मुताबिक खाने की जरूरत नहीं है। दोनों अपनी पसंद का खाना खा सकते हैं।
इसी तरह अगर एक व्यक्ति शाम 7 बजे डिनर करना चाहता है और दूसरे को देर रात भूख लगती है तो दोनों अपनी सुविधा के मुताबिक अलग-अलग समय पर खाना खा सकते हैं।
डाइट और फूड प्रेफरेंस भी बन सकती है वजह
खाने की पसंद में अंतर सिर्फ स्वाद तक सीमित नहीं होता। कई बार डाइट, फूड एलर्जी, शाकाहारी-मांसाहारी पसंद या किसी खास खाद्य पदार्थ से परहेज भी कपल्स के बीच खाने को लेकर मतभेद की वजह बन सकता है।
ऐसे में रोजाना दोनों की पसंद को एक साथ मिलाने की कोशिश तनाव का कारण बन सकती है। ‘फूड डिवोर्स’ का विचार इसी तरह के रोजाना के दबाव को कम करने का एक तरीका माना जा रहा है।
‘आज क्या खाएं?’ से शुरू होती है बहस
कई घरों में शाम होते ही बातचीत शुरू होती है- आज क्या खाएं? इसके बाद एक पार्टनर कहता है, ‘मुझे नहीं पता, तुम बताओ।’ फिर काफी देर तक यह तय नहीं हो पाता कि खाना क्या बनाया जाए।
किसी को पास्ता खाना है तो किसी का मन चावल खाने का होता है। एक व्यक्ति घर पर खाना बनाने के मूड में होता है तो दूसरा बाहर से ऑर्डर करना चाहता है। एक-दो दिन ऐसा होना सामान्य है, लेकिन यही बातचीत अगर रोजाना बहस में बदल जाए तो खाने जैसी साधारण चीज भी रिश्ते में तनाव का कारण बन सकती है।
साथ खाना जरूरी नहीं, साथ रहना जरूरी है
‘फूड डिवोर्स’ का मतलब यह भी नहीं है कि कपल कभी साथ खाना नहीं खाएंगे। जब दोनों की पसंद एक हो तो वे साथ खाना खा सकते हैं। वीकेंड पर साथ नाश्ता कर सकते हैं या किसी खास मौके पर बाहर डिनर के लिए जा सकते हैं।
इसका मुख्य विचार यह है कि साथ खाना रिश्ते की अनिवार्य जिम्मेदारी न बने। अगर किसी दिन दोनों की पसंद अलग है तो उस बात को लेकर बहस करने के बजाय दोनों अपनी पसंद के मुताबिक खाना चुन सकते हैं।
खाना बनाने से लेकर सामान खरीदने तक का दबाव कम
खाने से जुड़े कई छोटे-बड़े काम होते हैं- क्या बनाना है, सामान कौन लाएगा, खाना कौन बनाएगा और किसकी पसंद को प्राथमिकता दी जाएगी। जब इन सवालों पर बार-बार मतभेद होने लगे तो यह रोजाना का मानसिक दबाव बन सकता है।
अलग-अलग खाना खाने की व्यवस्था में दोनों अपनी सुविधा के मुताबिक फैसला कर सकते हैं। इससे हर दिन पार्टनर की पसंद के साथ समझौता करने का दबाव कम हो सकता है।
हालांकि, ‘फूड डिवोर्स’ किसी रिश्ते की समस्या का इलाज नहीं है। अगर खाने की पसंद को लेकर मतभेद रिश्ते में बड़े तनाव का हिस्सा बन चुके हैं, तो कपल्स के बीच खुलकर बातचीत और आपसी सहमति ज्यादा जरूरी है।
