नई दिल्ली: मणिपुर में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स (NRC) को लेकर एक बार फिर सियासी और सामाजिक बहस तेज हो गई है। कुकी-ज़ो काउंसिल (KZC) ने कुछ मैतेई और नागा संगठनों की उस मांग का विरोध किया है, जिसमें 2027 की जनगणना से पहले राज्य में NRC लागू करने की मांग की जा रही है। KZC ने इस मांग को जल्दबाजी में उठाया गया कदम बताया है।
NRC लागू करने का अधिकार केंद्र के पास: KZC
KZC के सूचना एवं प्रचार सचिव गिन्जा वुअलजोंग की ओर से जारी बयान में कहा गया कि NRC एक राष्ट्रीय प्रक्रिया है और इसे लागू करने या इसकी समयसीमा तय करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है। काउंसिल के मुताबिक, किसी राज्य सरकार या समुदाय को अपनी तरफ से राज्य में अलग NRC शुरू करने का अधिकार नहीं है।
KZC ने कहा कि मणिपुर में आबादी और जनसांख्यिकी को लेकर लगातार अलग-अलग दावे सामने आते रहे हैं। ऐसे में वास्तविक स्थिति जानने के लिए निष्पक्ष जनगणना जरूरी है।
2027 की जनगणना के आंकड़ों का इंतजार करने की अपील
काउंसिल का कहना है कि जनगणना जनसंख्या और जनसांख्यिकीय आंकड़ों का आधिकारिक आधार है। इसलिए 2027 की जनगणना के आंकड़े पूरी तरह तैयार होकर सार्वजनिक होने से पहले NRC लागू करने की मांग उचित नहीं है।
KZC ने सभी पक्षों से जनगणना प्रक्रिया को बिना किसी बाधा के पूरा होने देने की अपील की है।
परिसीमन प्रक्रिया का KZC ने किया स्वागत
KZC ने मणिपुर में परिसीमन (Delimitation) की प्रक्रिया का भी स्वागत किया है। काउंसिल के अनुसार, 2021 की जनगणना में देरी के कारण परिसीमन प्रक्रिया भी प्रभावित हुई थी।
संगठन का मानना है कि सत्यापित जनसांख्यिकीय आंकड़ों के आधार पर परिसीमन होने से राज्य में राजनीतिक प्रतिनिधित्व को अधिक सही तरीके से तय करने में मदद मिल सकती है।
असम NRC का दिया उदाहरण
मणिपुर में NRC की मांग के संदर्भ में KZC ने असम NRC के अनुभव का भी हवाला दिया। काउंसिल के मुताबिक, 1985 के असम समझौते के तहत हुई NRC प्रक्रिया में करीब 19 लाख लोग अंतिम सूची से बाहर रह गए थे। इसके बाद कई मामले फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल और कानूनी अपील की प्रक्रिया तक पहुंचे।
KZC ने कहा कि मणिपुर में NRC की मांग करने वाले संगठनों को ऐसी प्रक्रिया की जटिलता के साथ-साथ उसके सामाजिक और कानूनी प्रभावों पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए।
घाटी क्षेत्रों में जारी हैं प्रदर्शन
मणिपुर में NRC को लेकर अलग-अलग राजनीतिक दलों और समुदायों से जुड़े नागरिक संगठनों की अलग-अलग राय सामने आ रही है। बीजेपी, कांग्रेस और नागा-मैतेई संगठनों से जुड़े कई लोग 1951 को आधार वर्ष मानकर NRC पूरा होने तक जनगणना प्रक्रिया टालने की मांग कर रहे हैं।
इस मांग को लेकर मणिपुर के घाटी क्षेत्रों में प्रदर्शन भी हो रहे हैं। कई स्थानों पर धरने और रात में रैलियां आयोजित की जा रही हैं।
मुख्यमंत्री से छात्रों ने की मुलाकात
रिपोर्ट के मुताबिक, 20 अगस्त को मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद ने छात्रों के एक प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की थी। इस दौरान उन्होंने राज्य में NRC लागू करने के समर्थन की बात कही और भरोसा दिलाया कि 2 सितंबर से शुरू होने वाले विधानसभा सत्र में मणिपुर में NRC लागू करने के मुद्दे पर चर्चा की जाएगी।
NRC पर दो धड़ों में बंटी राय
फिलहाल मणिपुर में NRC को लेकर दो अलग-अलग मत सामने आ रहे हैं। एक पक्ष 1951 को आधार वर्ष मानकर जल्द NRC प्रक्रिया शुरू करने की मांग कर रहा है, जबकि KZC का कहना है कि पहले निष्पक्ष जनगणना पूरी होनी चाहिए और उसके बाद सत्यापित जनसांख्यिकीय आंकड़ों के आधार पर आगे की प्रक्रिया पर विचार किया जाना चाहिए।
KZC ने यह भी कहा है कि जनसांख्यिकीय मुद्दों का इस्तेमाल किसी समुदाय के खिलाफ प्रचार या उत्पीड़न के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
