आँकड़े नहीं, एक भयावह हकीकत
दिल्ली में सिर्फ 15 दिनों के भीतर 807 लोगों का गायब हो जाना कोई सामान्य खबर नहीं है। यह एक ऐसी डरावनी सच्चाई है, जो देश की राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था को कठघरे में खड़ा करती है। इनमें सबसे ज़्यादा संख्या महिलाओं और बच्चों की होना इस संकट को और भी गंभीर बना देता है। यह सिर्फ कानून-व्यवस्था का मामला नहीं, बल्कि एक मानवीय आपदा है, जो पूरे समाज को झकझोर देती है।
राजधानी में डर और असुरक्षा का माहौल
आज दिल्ली के कई इलाकों में डर साफ महसूस किया जा सकता है। माता-पिता बच्चों को अकेले बाहर भेजने से कतराते हैं, महिलाएँ देर शाम घर लौटते समय असुरक्षित महसूस करती हैं। जब गुमशुदगी की खबरें रोज़मर्रा की सुर्खियाँ बन जाएँ, तो यह साफ संकेत है कि व्यवस्था लोगों को सुरक्षा का भरोसा देने में नाकाम हो रही है।
महिलाएँ और बच्चे क्यों सबसे ज़्यादा शिकार?
महिलाओं और बच्चों का बड़ी संख्या में गायब होना कई गंभीर आशंकाओं को जन्म देता है—मानव तस्करी, बाल श्रम, यौन शोषण और संगठित अपराध। कई मामलों में गुमशुदगी की शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया जाता, एफआईआर दर्ज करने में देरी होती है और शुरुआती जाँच बेहद ढीली रहती है, जबकि शुरुआती 24–48 घंटे सबसे अहम होते हैं।
पुलिस व्यवस्था पर उठते सवाल
दिल्ली पुलिस देश की सबसे बड़ी और आधुनिक पुलिस व्यवस्थाओं में गिनी जाती है। सीसीटीवी कैमरे, गश्त, तकनीकी संसाधन—सब कुछ मौजूद है। फिर भी इतने बड़े पैमाने पर लोगों का गायब होना यह सवाल खड़ा करता है कि क्या संसाधनों का सही इस्तेमाल हो रहा है? या फिर ज़मीनी स्तर पर जवाबदेही और इच्छाशक्ति की भारी कमी है?
सत्ता में पूरी ताकत, फिर भी हालात क्यों बिगड़े?
दिल्ली की कानून-व्यवस्था सीधे केंद्र सरकार और गृह मंत्रालय के अधीन है। हर स्तर पर BJP की सत्ता होने के बावजूद अगर राजधानी सुरक्षित नहीं है, तो यह एक गंभीर राजनीतिक और प्रशासनिक विफलता मानी जाएगी। सत्ता में होने का मतलब सिर्फ उपलब्धियाँ गिनाना नहीं, बल्कि जनता की सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाना भी है।
सामाजिक असमानता और बढ़ता अपराध
दिल्ली में तेज़ी से बढ़ती आबादी, बेरोज़गारी, झुग्गी-झोपड़ियों की अनदेखी और प्रवासी मज़दूरों की असुरक्षित स्थिति अपराध को बढ़ावा देती है। जब समाज का बड़ा हिस्सा हाशिए पर छोड़ दिया जाता है, तो वह सबसे पहले अपराध का शिकार बनता है।
समाधान और ज़रूरत
दिल्ली को सुरक्षित बनाने के लिए सिर्फ कड़े कानून नहीं, बल्कि उनका ईमानदार अमल ज़रूरी है। गुमशुदगी के मामलों में त्वरित कार्रवाई, पुलिस सुधार, पीड़ित परिवारों के प्रति संवेदनशील रवैया, तेज़ न्याय प्रक्रिया और राजनीतिक जवाबदेही—यही हालात बदल सकते हैं।
निष्कर्ष: सवाल अब भी कायम
807 लोग कोई संख्या नहीं, बल्कि 807 परिवारों की टूटती उम्मीदें हैं। अगर देश की राजधानी ही सुरक्षित नहीं है, तो आम नागरिक कहाँ भरोसा करे? अब वक्त चुप्पी का नहीं, ठोस कार्रवाई और जवाबदेही का है।
