पूर्व तहलका (Tehelka) के प्रधान संपादक तरुण तेजपाल से जुड़े 2013 के चर्चित यौन उत्पीड़न मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए गोवा की ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए बरी किए जाने के आदेश को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने गोवा सरकार की अपील स्वीकार करते हुए तेजपाल को दोषी ठहराया। इस फैसले के साथ ही एक दशक से अधिक समय से चल रहे इस बहुचर्चित मामले में नया कानूनी मोड़ आ गया है। हालांकि, सजा कितनी होगी, इस पर अदालत अलग से सुनवाई करेगी। दूसरी ओर, तेजपाल की ओर से संकेत दिए गए हैं कि इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी।
यह मामला नवंबर 2013 का है, जब तहलका की एक जूनियर महिला सहकर्मी ने आरोप लगाया था कि गोवा में आयोजित पत्रिका के वार्षिक कार्यक्रम के दौरान होटल की लिफ्ट में तरुण तेजपाल ने दो अलग-अलग मौकों पर उनका यौन उत्पीड़न किया। शिकायतकर्ता का आरोप था कि उन्होंने बार-बार विरोध किया, लेकिन इसके बावजूद कथित घटना हुई। इन आरोपों के सामने आने के बाद पूरे देश में मीडिया जगत, कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा और यौन उत्पीड़न जैसे गंभीर मुद्दों पर व्यापक बहस शुरू हो गई थी।
शिकायत दर्ज होने के बाद गोवा पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू की। जांच के दौरान पुलिस ने होटल के सीसीटीवी फुटेज, इलेक्ट्रॉनिक संचार, गवाहों के बयान और अन्य दस्तावेजी साक्ष्यों को एकत्र किया। इसके बाद भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत तेजपाल के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया गया।
पूरे मामले के दौरान तरुण तेजपाल ने सभी आरोपों से इनकार किया। उनका कहना था कि शिकायतकर्ता के साथ जो भी बातचीत या संपर्क हुआ, वह आपसी सहमति से हुआ था। बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा है और जांच में कई खामियां थीं।
कई वर्षों तक चली सुनवाई के बाद मई 2021 में गोवा की सत्र अदालत ने तरुण तेजपाल को सभी आरोपों से बरी कर दिया था। ट्रायल कोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि अभियोजन पक्ष आरोपों को पर्याप्त रूप से साबित नहीं कर सका। इस फैसले पर देशभर में अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आईं। कई कानूनी विशेषज्ञों और महिला अधिकार संगठनों ने ट्रायल कोर्ट के तर्कों पर सवाल उठाए, जबकि कुछ लोगों ने अदालत के फैसले का समर्थन भी किया।
इसके बाद गोवा सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट में इस फैसले को चुनौती दी। राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि ट्रायल कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों का सही तरीके से मूल्यांकन नहीं किया और कई महत्वपूर्ण तथ्यों की अनदेखी की। सरकार ने यह भी कहा कि निचली अदालत ने कानून की व्याख्या में गंभीर त्रुटियां की हैं, जिसके कारण आरोपी को बरी किया गया।
मामले की विस्तृत सुनवाई के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने गोवा सरकार की दलीलों से सहमति जताई। अदालत ने माना कि ट्रायल कोर्ट का फैसला कानून और उपलब्ध साक्ष्यों के अनुरूप नहीं था। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने बरी करने के आदेश को रद्द करते हुए तरुण तेजपाल को दोषी करार दिया। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सजा पर अंतिम फैसला अलग से सुनवाई के बाद सुनाया जाएगा।
भारतीय कानून के अनुसार यौन अपराध से जुड़े मामलों में पीड़िता की पहचान उजागर नहीं की जा सकती। इसलिए शिकायतकर्ता का नाम और अन्य पहचान संबंधी जानकारी गोपनीय रखी गई है।
हाईकोर्ट के इस फैसले ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि यौन उत्पीड़न के मामलों में अदालतों को साक्ष्यों का मूल्यांकन किस प्रकार करना चाहिए। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि अपीलीय अदालतों का दायित्व केवल निचली अदालत के फैसले की समीक्षा करना ही नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि न्यायिक प्रक्रिया में किसी प्रकार की कानूनी त्रुटि न रह जाए। यदि किसी फैसले में गंभीर कानूनी या तथ्यात्मक गलती पाई जाती है, तो हाईकोर्ट उसे पलट सकता है।
इस फैसले के बाद यह मामला एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया है। मीडिया, कानूनी विशेषज्ञ और महिला अधिकार संगठन इस निर्णय को अलग-अलग नजरिए से देख रहे हैं। कई लोगों का मानना है कि यह फैसला न्यायिक समीक्षा की प्रक्रिया को मजबूत करता है, जबकि अन्य की नजर अब सुप्रीम कोर्ट में संभावित अपील पर टिकी हुई है।
तरुण तेजपाल की ओर से संकेत दिए गए हैं कि वे बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगे। यदि ऐसा होता है, तो देश की सर्वोच्च अदालत इस मामले में हाईकोर्ट के फैसले और उसके कानूनी आधार की समीक्षा करेगी।
एक दशक से अधिक समय तक चले इस मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला भारतीय न्यायिक व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह निर्णय न केवल इस विशेष मामले के लिए अहम है, बल्कि कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा, यौन उत्पीड़न के मामलों की सुनवाई और न्यायिक जवाबदेही को लेकर भी व्यापक प्रभाव डाल सकता है। अब सभी की निगाहें सजा के ऐलान और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट में होने वाली संभावित सुनवाई पर टिकी हैं।
