अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ आर्थिक दबाव को एक नए स्तर पर ले जाने की चेतावनी दी है। ट्रंप ने कहा है कि जो भी देश ईरान को किसी भी तरह की आर्थिक या वित्तीय मदद देगा, उसे गंभीर आर्थिक परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। उन्होंने इस अभियान को अभूतपूर्व स्तर की “आर्थिक जंग और अलगाव” बताया है।
ट्रंप की यह चेतावनी ऐसे समय आई है जब अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष को लगभग छह महीने हो चुके हैं। इस संघर्ष ने केवल दोनों देशों को ही प्रभावित नहीं किया, बल्कि पूरे खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ाया है। हजारों लोगों की मौत और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच वैश्विक बाजार भी दबाव में हैं। खास तौर पर होर्मुज जलडमरूमध्य में शिपिंग को लेकर स्थिति बेहद संवेदनशील बनी हुई है। यह मार्ग दुनिया के महत्वपूर्ण तेल व्यापार मार्गों में शामिल है।
ट्रंप ने अपने संदेश में साफ संकेत दिया कि अमेरिका अब केवल ईरान पर प्रतिबंध लगाने तक सीमित नहीं रहना चाहता। उनकी नजर उन देशों और कंपनियों पर भी है जो ईरान के साथ व्यापार कर रहे हैं या उसे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था तक पहुंच दिलाने में मदद कर रहे हैं। ट्रंप ने वित्तीय संस्थानों, कारोबारियों, हवाई अड्डों और सरकारी संस्थाओं को चेतावनी दी है कि यदि वे ईरान के लिए किसी तरह की आर्थिक “लाइफलाइन” उपलब्ध कराते हैं तो उन्हें भी भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।
अमेरिका विशेष रूप से उन नेटवर्क पर कार्रवाई करना चाहता है जिनके माध्यम से ईरान तेल बेचता है और विदेशी मुद्रा हासिल करता है। तेल तस्करी, नकद हस्तांतरण, शिपिंग रजिस्ट्रियां, फ्रंट कंपनियां और अन्य वित्तीय माध्यम अमेरिकी प्रतिबंधों के संभावित निशाने पर हो सकते हैं। इसका उद्देश्य ईरान की अर्थव्यवस्था पर इतना दबाव बनाना है कि तेहरान को अपनी रणनीति बदलने और बातचीत की मेज पर लौटने के लिए मजबूर किया जा सके।
लेकिन इस नीति का असर केवल ईरान तक सीमित नहीं रहेगा। चीन ईरान के प्रमुख तेल खरीदारों में शामिल है। यदि अमेरिका ईरान के साथ कारोबार करने वाली चीनी कंपनियों या वित्तीय संस्थानों पर भी प्रतिबंध लगाता है, तो इससे पहले से तनावपूर्ण अमेरिका-चीन संबंध और खराब हो सकते हैं। चीन अमेरिकी प्रतिबंधों का विरोध कर सकता है और जवाबी आर्थिक कदम उठाने की संभावना भी पैदा हो सकती है।
दूसरी ओर, ईरान ने ट्रंप की धमकी को खारिज कर दिया है। ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अमेरिकी अभियान को “आर्थिक आतंकवाद” बताते हुए कहा है कि इस तरह की धमकियों से ईरान आत्मसमर्पण नहीं करेगा। हालांकि तेहरान ने यह भी संकेत दिया है कि बातचीत का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं हुआ है, लेकिन ईरान ऐसी बातचीत स्वीकार नहीं करना चाहता जिसे वह दबाव या आत्मसमर्पण के रूप में देखता हो।
इस पूरे संकट में होर्मुज जलडमरूमध्य सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक बन गया है। इस रास्ते से बड़ी मात्रा में वैश्विक तेल व्यापार होता है। युद्ध और तनाव के कारण यहां जहाजों की आवाजाही को लेकर लगातार अनिश्चितता बनी हुई है। रॉयटर्स के अनुसार, 20 अगस्त को इस जलमार्ग में शिपिंग गतिविधि पिछले दिन की तुलना में लगभग अपरिवर्तित रही, जबकि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम करने के प्रयास जारी हैं।
अगर अमेरिका ईरान के साथ व्यापार करने वाले तीसरे देशों पर भी बड़े पैमाने पर प्रतिबंध लगाता है, तो इसका असर वैश्विक तेल कीमतों, शिपिंग लागत, बीमा और अंतरराष्ट्रीय कारोबार पर पड़ सकता है। तेल की कीमतों में बढ़ोतरी से भारत समेत कई आयातक देशों की अर्थव्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ सकता है। परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ने से महंगाई का खतरा भी बढ़ सकता है।
ट्रंप की नई रणनीति इसलिए सिर्फ ईरान के खिलाफ आर्थिक कार्रवाई नहीं है, बल्कि यह पूरी अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था के लिए एक बड़ा परीक्षण बन सकती है। अमेरिका चाहता है कि उसके सहयोगी ईरान को आर्थिक रूप से अलग-थलग करने में उसका साथ दें। लेकिन कई देश अपने ऊर्जा हितों और व्यापारिक संबंधों के कारण स्वतंत्र नीति अपनाना चाह सकते हैं।
ईरान पहले ही कई दशकों से अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना कर रहा है और उसने वैकल्पिक व्यापारिक नेटवर्क विकसित किए हैं। अब यदि वॉशिंगटन इन नेटवर्क को भी निशाना बनाता है, तो आने वाले दिनों में आर्थिक और कूटनीतिक टकराव और बढ़ सकता है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, ईरानी नेतृत्व इस बात को लेकर चिंतित है कि और अधिक आर्थिक दबाव देश में आर्थिक मुश्किलें और सामाजिक असंतोष बढ़ा सकता है।
ऐसे में ट्रंप की “आर्थिक जंग” की चेतावनी आने वाले समय में अमेरिका-ईरान संघर्ष की दिशा तय कर सकती है। यदि प्रतिबंधों से तेहरान बातचीत के लिए तैयार होता है तो अमेरिकी रणनीति को सफलता मिल सकती है। लेकिन यदि ईरान और उसके सहयोगी इसका विरोध करते हैं, तो यह संकट एक व्यापक वैश्विक आर्थिक और भू-राजनीतिक टकराव में बदल सकता है।
फिलहाल इतना स्पष्ट है कि वॉशिंगटन ने ईरान के खिलाफ दबाव बढ़ाने का फैसला कर लिया है और अब उसकी नजर केवल तेहरान पर नहीं, बल्कि उन सभी देशों और संस्थाओं पर भी है जो ईरान की अर्थव्यवस्था को सहारा दे रहे हैं।
