नई दिल्ली: सोशल मीडिया और स्मार्टफोन के दौर में विरोध-प्रदर्शन का तरीका तेजी से बदल रहा है। अब किसी प्रदर्शन की तस्वीरें और वीडियो केवल मौके पर मौजूद लोगों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि कुछ ही मिनटों में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर हजारों और लाखों लोगों तक पहुंच सकते हैं। इसी बदलते माहौल को देखते हुए दिल्ली पुलिस ने Gen Z प्रदर्शनकारियों से निपटने के लिए अपने जवानों के व्यवहार को लेकर नई गाइडलाइन जारी की है। इस गाइडलाइन का सबसे अहम संदेश है कि पुलिसकर्मी गुस्से में प्रतिक्रिया देने से बचें और कैमरे के सामने संयम बनाए रखें।
रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली पुलिस के जवानों से कहा गया है कि प्रदर्शन के दौरान उन्हें यह मानकर चलना चाहिए कि वे कैमरे की निगरानी में हैं। प्रदर्शनकारी मोबाइल फोन से पुलिसकर्मियों की गतिविधियों को रिकॉर्ड कर सकते हैं और बाद में उन वीडियो को सोशल मीडिया पर शेयर कर सकते हैं। ऐसे में पुलिसकर्मी का एक गुस्सैल चेहरा, तीखी प्रतिक्रिया या किसी प्रदर्शनकारी के साथ बहस कुछ ही समय में वायरल वीडियो का हिस्सा बन सकती है।
गाइडलाइन में बेहद खास तरीके से पुलिसकर्मियों को समझाया गया है कि प्रदर्शनकारी उनके खिलाफ व्यक्तिगत लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं, बल्कि कई बार वे ऐसी स्थिति बना सकते हैं जिसमें पुलिसकर्मी की प्रतिक्रिया ही वीडियो का मुख्य हिस्सा बन जाए। रिपोर्ट में इस सोच को एक संदेश के जरिए समझाया गया है कि “आपका गुस्सैल चेहरा उनका कंटेंट है।” पुलिसकर्मियों से कहा गया है कि वे ऐसी भूमिका निभाने से बचें जिसमें उनकी नाराजगी प्रदर्शनकारियों के लिए सोशल मीडिया कंटेंट बन जाए।
नई गाइडलाइन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बातचीत को लेकर है। पुलिसकर्मियों को प्रदर्शनकारियों के साथ अनावश्यक बहस करने से बचने की सलाह दी गई है। यदि कोई प्रदर्शनकारी लगातार सवाल करता है, व्यक्तिगत टिप्पणी करता है या पुलिसकर्मी को भावनात्मक प्रतिक्रिया देने के लिए उकसाता है, तो जवानों को संयम बनाए रखने के लिए कहा गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, प्रदर्शनकारी रो सकते हैं, भावुक बातें कर सकते हैं, पुलिसकर्मियों के सामने व्यक्तिगत समस्याओं का जिक्र कर सकते हैं या परिवार और वेतन जैसे मुद्दों से जुड़े सवाल पूछ सकते हैं। ऐसे मामलों में पुलिसकर्मियों को बहस करने या अपनी व्यक्तिगत राय जाहिर करने से बचने की सलाह दी गई है। जरूरत पड़ने पर केवल इतना कहा जा सकता है कि “कृपया सहयोग करें, हम अपना कर्तव्य निभा रहे हैं।” इसके बाद बातचीत को आगे नहीं बढ़ाने और शांत रहने की सलाह दी गई है।
यह गाइडलाइन हाल के जंतर-मंतर प्रदर्शनों के बाद खास तौर पर चर्चा में आई है। जुलाई में परीक्षा से जुड़े मुद्दों को लेकर बड़ी संख्या में युवाओं और छात्रों ने दिल्ली में प्रदर्शन किया था। प्रदर्शन के दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से फैले। इस पूरे घटनाक्रम ने यह दिखाया कि आज के दौर में प्रदर्शन स्थल पर होने वाली कोई भी घटना तुरंत डिजिटल प्लेटफॉर्म पर पहुंच सकती है।
Gen Z प्रदर्शनकारियों की एक खास पहचान यह भी है कि वे सोशल मीडिया का इस्तेमाल केवल प्रदर्शन की जानकारी देने के लिए नहीं करते, बल्कि वीडियो, मीम्स, रील्स और लाइव कंटेंट के जरिए अपनी बात को व्यापक स्तर तक पहुंचाते हैं। जंतर-मंतर के प्रदर्शनों के दौरान भी मोबाइल कैमरों की भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही। Reuters Institute ने भी भारत में हुए हालिया युवा आंदोलनों में डिजिटल प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया की बढ़ती भूमिका को रेखांकित किया है।
दिल्ली पुलिस की गाइडलाइन में केवल बातचीत को लेकर ही निर्देश नहीं हैं। पुलिसकर्मियों को उकसावे के बावजूद मोबाइल फोन को धक्का देने, किसी वस्तु को छीनने या फेंकने और गुस्से में चिल्लाने जैसी आक्रामक प्रतिक्रियाओं से बचने की सलाह दी गई है। रिपोर्ट के अनुसार, मजाक, तंज, गाने, डांस, नकली सलामी या प्लेकार्ड दिखाए जाने पर भी पुलिसकर्मियों को प्रतिक्रिया नहीं देने के लिए कहा गया है।
महिला प्रदर्शनकारियों के साथ व्यवहार को लेकर भी सावधानी बरतने की सलाह दी गई है। पुलिसकर्मियों को अनावश्यक रूप से महिलाओं को छूने से बचने के लिए कहा गया है। इसके अलावा, यदि कोई प्रदर्शनकारी बेहोश हो जाए या घायल हो जाए तो उसकी मदद करने तथा एंबुलेंस, बुजुर्गों और स्कूली बच्चों की आवाजाही को आसान बनाए रखने पर भी जोर दिया गया है। पुलिस से सम्मानजनक भाषा और बॉडी लैंग्वेज बनाए रखने की अपेक्षा की गई है।
इस पूरी गाइडलाइन का उद्देश्य पुलिस की कार्रवाई को कमजोर करना नहीं, बल्कि अनावश्यक टकराव को कम करना बताया जा रहा है। प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है, लेकिन सोशल मीडिया के दौर में पुलिसकर्मियों का व्यक्तिगत व्यवहार भी सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा बन जाता है।
जंतर-मंतर घटनाक्रम को लेकर पुलिस की भूमिका पर सवाल भी उठे हैं। दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट के सामने जुलाई के प्रदर्शन के दौरान बल प्रयोग को लेकर कहा था कि उसने अधिकतम संयम बरता और स्थिति को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक न्यूनतम बल का इस्तेमाल किया। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस कार्रवाई पर लगे आरोपों की जांच के लिए एक उच्चस्तरीय समिति गठित करने की बात कही है।
ऐसे माहौल में नई गाइडलाइन दिल्ली पुलिस के लिए एक तरह की संचार रणनीति भी है। अब पुलिसकर्मी केवल भीड़ को नियंत्रित नहीं कर रहे हैं, बल्कि उन्हें यह भी ध्यान रखना पड़ रहा है कि उनका हर शब्द और हर प्रतिक्रिया कैमरे में रिकॉर्ड हो सकती है।
सोशल मीडिया के इस दौर में कुछ सेकंड का वीडियो पूरे घटनाक्रम की धारणा बदल सकता है। इसलिए पुलिस के लिए शांत रहना केवल अनुशासन का हिस्सा नहीं, बल्कि सार्वजनिक विश्वास बनाए रखने का भी महत्वपूर्ण तरीका बन गया है।
दिल्ली पुलिस का संदेश साफ दिखाई देता है—प्रदर्शनकारी चाहे जितना उकसाएं, पुलिसकर्मी को अपना संयम नहीं खोना चाहिए। क्योंकि आज किसी प्रदर्शन में केवल नारे और भीड़ ही कहानी नहीं बनाते। एक मोबाइल कैमरा भी कहानी लिख सकता है, और उसमें पुलिसकर्मी का गुस्सा सबसे ज्यादा दिखाई देने वाला हिस्सा बन सकता है।
