Alpha Review: दमदार एक्शन के बावजूद कहानी क्यों नहीं छोड़ पाती गहरी छाप?

Alpha Review: दमदार एक्शन के बावजूद कहानी क्यों नहीं छोड़ पाती गहरी छाप?

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यशराज फिल्म्स के स्पाई यूनिवर्स ने पिछले कुछ वर्षों में भारतीय सिनेमा को कई बड़े एक्शन ब्लॉकबस्टर दिए हैं। एक था टाइगर, वॉर, पठान और टाइगर 3 जैसी फिल्मों ने दर्शकों के बीच इस यूनिवर्स को एक अलग पहचान दिलाई। अब इसी कड़ी में अल्फा एक नई शुरुआत करने की कोशिश करती है। खास बात यह है कि यह स्पाई यूनिवर्स की पहली महिला-केंद्रित फिल्म है, जिसमें आलिया भट्ट और शरवरी मुख्य भूमिकाओं में नजर आती हैं। फिल्म का पैमाना बड़ा है, एक्शन शानदार है और तकनीकी स्तर भी प्रभावशाली है, लेकिन कहानी दर्शकों पर वैसा असर छोड़ने में सफल नहीं हो पाती, जैसी उम्मीद की गई थी।

फिल्म की शुरुआत काफी आकर्षक अंदाज में होती है। शुरुआती दृश्य ही यह संकेत दे देते हैं कि निर्माता किसी भी स्तर पर भव्यता से समझौता नहीं करना चाहते। विदेशी लोकेशंस, हाई-टेक गैजेट्स और स्टाइलिश सिनेमैटोग्राफी फिल्म को अंतरराष्ट्रीय जासूसी फिल्मों जैसा लुक देती है। एक्शन सीक्वेंस बड़े पर्दे पर रोमांच पैदा करते हैं और कई जगह दर्शकों को सीट से बांधे रखते हैं।

आलिया भट्ट ने अपने किरदार को पूरी ईमानदारी के साथ निभाया है। उन्होंने भावनात्मक और एक्शन दोनों पहलुओं में अच्छा संतुलन बनाने की कोशिश की है। शरवरी भी अपने रोल में प्रभाव छोड़ती हैं और दोनों अभिनेत्रियों की ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री फिल्म की सबसे मजबूत खूबियों में से एक बनकर सामने आती है। दोनों कलाकारों के बीच तालमेल स्वाभाविक लगता है और कई दृश्यों में यही फिल्म की सबसे बड़ी ताकत बन जाता है।

हालांकि फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी पटकथा है। कहानी शुरुआत में दिलचस्प लगती है, लेकिन जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, इसमें नया पन कम दिखाई देता है। कई मोड़ पहले से अनुमान लगाए जा सकते हैं और कुछ घटनाएं इतनी जल्दी घटती हैं कि उनका भावनात्मक असर दर्शकों तक पूरी तरह नहीं पहुंच पाता। फिल्म कई बार ऐसा महसूस कराती है कि वह कहानी से ज्यादा अपने एक्शन और स्टाइल पर भरोसा कर रही है।

दूसरे हिस्से में गति थोड़ी असंतुलित हो जाती है। लगातार एक्शन सीक्वेंस देखने में रोमांचक जरूर हैं, लेकिन जब उनके बीच मजबूत कहानी या किरदारों का विकास नहीं होता, तो दर्शकों का जुड़ाव धीरे-धीरे कम होने लगता है। कई सहायक पात्र भी ऐसे हैं जिनमें संभावनाएं थीं, लेकिन उन्हें पर्याप्त स्क्रीन टाइम या गहराई नहीं मिलती।

तकनीकी दृष्टि से फिल्म काफी मजबूत नजर आती है। बैकग्राउंड म्यूजिक हर बड़े दृश्य को प्रभावशाली बनाता है। कैमरा वर्क, एडिटिंग और विजुअल इफेक्ट्स मिलकर फिल्म को अंतरराष्ट्रीय स्तर का अनुभव देने की कोशिश करते हैं। कॉस्ट्यूम डिजाइन और प्रोडक्शन डिजाइन भी स्पाई थ्रिलर के माहौल को मजबूती प्रदान करते हैं।

फिल्म की एक खास उपलब्धि यह भी है कि यह महिला जासूसों को केंद्र में रखकर एक बड़े फ्रेंचाइज़ी की कहानी आगे बढ़ाने का प्रयास करती है। भारतीय सिनेमा में इस तरह की फिल्मों की संख्या अभी भी सीमित है। इसलिए अल्फा अपने विषय और प्रस्तुति के कारण अलग पहचान बनाने की क्षमता रखती है। यदि इसकी कहानी पर थोड़ा और काम किया गया होता तो यह स्पाई यूनिवर्स की सबसे यादगार फिल्मों में शामिल हो सकती थी।

कुल मिलाकर, अल्फा एक ऐसी फिल्म है जो अपनी शानदार प्रस्तुति, बड़े पैमाने के एक्शन और मुख्य कलाकारों के दमदार अभिनय से प्रभावित करती है, लेकिन भावनात्मक रूप से उतनी मजबूत पकड़ नहीं बना पाती। अगर आप हाई-वोल्टेज एक्शन, स्टाइलिश लोकेशंस और बड़े पर्दे का भव्य अनुभव पसंद करते हैं, तो यह फिल्म आपको निराश नहीं करेगी। वहीं, जो दर्शक गहरी कहानी, यादगार किरदार और अप्रत्याशित मोड़ों की उम्मीद लेकर जाएंगे, उन्हें फिल्म में कुछ कमी महसूस हो सकती है।

अल्फा यह साबित करती है कि किसी भी स्पाई फिल्म के लिए सिर्फ शानदार एक्शन और तकनीकी चमक ही काफी नहीं होती। लंबे समय तक याद रहने के लिए मजबूत कहानी और भावनात्मक गहराई भी उतनी ही जरूरी होती है।

author

जितेन्द्र कुमार

जितेन्द्र कुमार उत्तर प्रदेश के हाथरस के रहने वाले एक भारतीय पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जो वरिष्ठ पत्रकार और एक्सपर्ट टाइम्स नेटवर्क प्राइवेट लिमिटेड के संस्थापक के रूप में जाने जाते हैं।

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