यमन में एक बार फिर संघर्ष तेज होने के संकेत मिले हैं। यमन की सेना ने दावा किया है कि उसने हूती विद्रोहियों के ठिकानों को निशाना बनाकर सैकड़ों हमले किए हैं। सेना के मुताबिक, इन सैन्य कार्रवाइयों में करीब 700 लोगों की मौत हुई है। हालांकि, इस आंकड़े की स्वतंत्र रूप से पुष्टि अभी नहीं हुई है और यह संख्या यमन की सेना द्वारा किए गए दावे पर आधारित है।
सेना के अनुसार, अभियान का मुख्य उद्देश्य हूती संगठन की सैन्य क्षमता को कमजोर करना और उसके महत्वपूर्ण ठिकानों को नष्ट करना था। हमलों में कथित तौर पर उन स्थानों को निशाना बनाया गया जहां हथियार, सैन्य उपकरण और अन्य रणनीतिक संसाधन मौजूद होने की जानकारी थी। सैन्य अधिकारियों का कहना है कि इस कार्रवाई से हूती लड़ाकों की गतिविधियों पर असर पड़ा है।
यमन पिछले एक दशक से भी अधिक समय से राजनीतिक और सैन्य संघर्ष से जूझ रहा है। हूती आंदोलन ने वर्ष 2014 में राजधानी सना पर नियंत्रण स्थापित कर लिया था। इसके बाद देश में राजनीतिक संकट और गहरा गया। वर्ष 2015 में सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यमनी सरकार के समर्थन में सैन्य हस्तक्षेप किया। इसके बाद संघर्ष ने बड़े क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले लिया।
समय के साथ यमन में कई राजनीतिक और सैन्य गुट सक्रिय हो गए। अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग ताकतों का प्रभाव बना हुआ है। इस वजह से देश में स्थायी राजनीतिक समाधान निकालना बेहद मुश्किल रहा है।
हाल के वर्षों में संघर्ष की तीव्रता कुछ समय के लिए कम हुई थी और बातचीत के जरिए समाधान की उम्मीद भी जगी थी। लेकिन हूतियों की सैन्य ताकत और क्षेत्रीय गतिविधियों को लेकर तनाव बना रहा। अब यमन की सेना की ओर से सैकड़ों हमलों का दावा इस बात का संकेत है कि परिस्थितियां फिर से गंभीर हो सकती हैं।
इस पूरे घटनाक्रम का असर केवल यमन तक सीमित नहीं रह सकता। हूती संगठन का नाम लाल सागर में जहाजों पर हुए हमलों के कारण भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहा है। लाल सागर दुनिया के महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल है। यहां किसी भी तरह की अस्थिरता का असर अंतरराष्ट्रीय शिपिंग और सामानों की आवाजाही पर पड़ सकता है।
हालांकि, सैन्य अभियान को लेकर सबसे बड़ी चिंता आम नागरिकों की सुरक्षा को लेकर है। यमन की जनता पहले ही लंबे संघर्ष के कारण खाद्य संकट, बेरोजगारी, विस्थापन और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी जैसी समस्याओं से जूझ रही है। अगर लड़ाई और तेज होती है तो इन समस्याओं के और गंभीर होने की आशंका है।
सेना द्वारा बताए गए 700 मौतों के आंकड़े की भी स्वतंत्र जांच जरूरी होगी। यह स्पष्ट नहीं है कि इस संख्या में कितने हूती लड़ाके शामिल हैं और क्या इसमें आम नागरिक भी शामिल हैं। युद्ध के दौरान दोनों पक्ष अक्सर अपने-अपने पक्ष में अलग-अलग आंकड़े जारी करते हैं, इसलिए स्वतंत्र स्रोतों से पुष्टि महत्वपूर्ण हो जाती है।
अगर हमले बड़े पैमाने पर जारी रहते हैं तो हूती संगठन की ओर से जवाबी कार्रवाई की संभावना भी बनी रहेगी। इससे संघर्ष और बढ़ सकता है और क्षेत्रीय सुरक्षा पर दबाव बढ़ सकता है।
विशेषज्ञों के लिए सबसे बड़ा सवाल यह होगा कि क्या सैन्य कार्रवाई हूतियों की क्षमता को लंबे समय तक कमजोर कर पाएगी या फिर इससे संघर्ष का एक नया दौर शुरू होगा। पिछले वर्षों के अनुभव बताते हैं कि केवल सैन्य दबाव से यमन की राजनीतिक समस्या का स्थायी समाधान मुश्किल है।
यमन में स्थायी शांति के लिए राजनीतिक बातचीत, सत्ता में भागीदारी और विभिन्न गुटों के बीच समझौता जरूरी माना जाता है। लेकिन फिलहाल सेना के ताजा दावे ने देश की स्थिति को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
करीब 700 लोगों की मौत का दावा कितना सही है, यह आने वाले दिनों में स्वतंत्र जांच और अधिक जानकारी सामने आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा। फिलहाल इतना जरूर है कि यमन में तनाव एक बार फिर बढ़ता दिखाई दे रहा है और इसका सबसे बड़ा खतरा उन लाखों नागरिकों पर पड़ सकता है, जो वर्षों से युद्ध का खामियाजा भुगत रहे हैं।
