नई दिल्ली: चिकित्सा विज्ञान के इतिहास में जेनोट्रांसप्लांटेशन को लेकर एक बड़ी उपलब्धि सामने आई है। अमेरिका में डॉक्टरों ने 66 वर्षीय टिम एंड्रयूज के शरीर में सूअर की किडनी का सफल ट्रांसप्लांट किया, जो करीब 271 दिनों तक काम करती रही। इसे किसी जानवर के अंग के इंसान के शरीर में इतने लंबे समय तक काम करने का अब तक का सबसे बड़ा रिकॉर्ड बताया जा रहा है।
इस ऐतिहासिक चिकित्सा प्रक्रिया और उसके नतीजों से जुड़ी रिपोर्ट प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल द लैंसेट में प्रकाशित हुई है। इस सफलता से उन मरीजों के लिए नई उम्मीद जगी है, जिन्हें इंसानी अंग मिलने के लिए लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है।
दोनों किडनियां खराब होने के बाद सामने आया संकट
टिम एंड्रयूज टाइप-2 डायबिटीज से पीड़ित थे। बीमारी के चलते उनकी दोनों किडनियां पूरी तरह खराब हो गई थीं। डॉक्टरों ने उन्हें बताया था कि इंसानी किडनी मिलने के लिए उन्हें करीब 7 साल तक इंतजार करना पड़ सकता है।
डायलिसिस पर निर्भर मरीजों के लिए इतना लंबा इंतजार बेहद मुश्किल हो सकता है। ऐसे में मैसाचुसेट्स जनरल हॉस्पिटल के डॉक्टरों ने टिम को जेनोट्रांसप्लांटेशन का विकल्प सुझाया।
25 जनवरी 2025 को हुआ सूअर की किडनी का ट्रांसप्लांट
डॉक्टरों ने 25 जनवरी 2025 को टिम एंड्रयूज के शरीर में आनुवंशिक रूप से बदली गई सूअर की किडनी ट्रांसप्लांट की।
ट्रांसप्लांट के बाद कई महीनों तक टिम को नियमित रूप से डायलिसिस कराने की जरूरत नहीं पड़ी। रिपोर्ट के मुताबिक, वह इस दौरान सामान्य जीवन जीने में सक्षम रहे।
क्या होता है जेनोट्रांसप्लांटेशन?
जब किसी जानवर के अंग, कोशिका या टिश्यू को इंसान के शरीर में ट्रांसप्लांट किया जाता है, तो इस प्रक्रिया को जेनोट्रांसप्लांटेशन कहा जाता है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, इंसानों के अंगों के आकार और बनावट से काफी हद तक समानता के कारण सूअर को जेनोट्रांसप्लांटेशन के लिए सबसे उपयुक्त जानवरों में माना जाता है। इसके अलावा, इंसानों को लंबे समय से सूअरों को पालने और उनके प्रजनन की प्रक्रिया का अनुभव भी है।
सीधे सूअर की किडनी इंसान में क्यों नहीं लगाई जा सकती?
जेनोट्रांसप्लांटेशन इतना आसान नहीं है कि किसी सामान्य सूअर की किडनी निकालकर उसे इंसान में ट्रांसप्लांट कर दिया जाए। ऐसा करने पर इंसान का इम्यून सिस्टम बाहरी अंग को तुरंत पहचानकर उस पर हमला कर सकता है और उसे तेजी से नुकसान पहुंचा सकता है।
इसी चुनौती से निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने विशेष रूप से युकाटन मिनिएचर पिग विकसित किए। इसकी किडनी के जीन में 69 जेनेटिक बदलाव किए गए, ताकि इंसान का प्रतिरक्षा तंत्र उसे आसानी से बाहरी अंग के रूप में पहचानकर नष्ट न करे।
छह महीने बाद किडनी में आई परेशानी
ट्रांसप्लांट के शुरुआती महीनों में टिम का शरीर इस किडनी को स्वीकार करता रहा। जब इम्यून सिस्टम ने शुरुआती दौर में अंग को अस्वीकार करने की कोशिश की, तो डॉक्टरों ने दवाइयों में बदलाव करके स्थिति को नियंत्रित किया।
हालांकि, करीब 6 महीने बाद सूअर की किडनी की रक्त वाहिकाओं में धीरे-धीरे नुकसान होने लगा। इसके कारण किडनी में सूजन आ गई और आखिरकार अक्टूबर 2025 में इस अंग ने काम करना बंद कर दिया।
इसके बाद डॉक्टरों को सर्जरी के जरिए सूअर की किडनी को शरीर से निकालना पड़ा।
सूअर की किडनी ने ‘ब्रिज’ की तरह किया काम
मास जनरल ब्रिघम के सेंटर फॉर ट्रांसप्लांटेशन साइंसेज के डॉक्टर लियोनार्डो रिएला के मुताबिक, सूअर की किडनी ने टिम एंड्रयूज के लिए एक ‘ब्रिज’ की तरह काम किया।
किडनी निकालने के बाद टिम को सिर्फ 82 दिनों तक दोबारा डायलिसिस पर रहना पड़ा। इसके बाद जनवरी 2026 में उन्हें एक मृत डोनर से इंसानी किडनी मिल गई।
अब इंसानी किडनी कर रही है काम
जनवरी 2026 में टिम एंड्रयूज को इंसानी डोनर किडनी मिलने के बाद उनका इलाज एक नए चरण में पहुंचा। डॉक्टरों के मुताबिक, उनके शरीर में अब इंसानी किडनी अच्छी तरह काम कर रही है।
टिम का मामला यह दिखाता है कि भविष्य में जेनोट्रांसप्लांटेशन उन मरीजों के लिए अस्थायी समाधान या ‘ब्रिज’ बन सकता है, जिन्हें इंसानी अंग मिलने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है।
