नई दिल्ली: बांग्लादेश के मंत्री हुमायूं कबीर और शमा उबैद इस्लाम के हालिया बयानों के बाद दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में एक नई चर्चा शुरू हो गई है। 22 अगस्त 2026 को मीडिया से बातचीत के दौरान दोनों नेताओं ने संकेत दिए कि ढाका ‘मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट’ में शामिल होने के विकल्प पर विचार कर सकता है। इस समझौते को कई जगहों पर ‘इस्लामिक NATO’ के नाम से भी संदर्भित किया जा रहा है।
अगर बांग्लादेश इस सुरक्षा ढांचे का हिस्सा बनता है तो इसका असर भारत की सुरक्षा रणनीति, पाकिस्तान के क्षेत्रीय प्रभाव और बंगाल की खाड़ी की रणनीतिक स्थिति पर पड़ सकता है। हालांकि, बांग्लादेश ने अभी तक इस गठबंधन में शामिल होने का कोई औपचारिक ऐलान नहीं किया है।
क्या है ‘मक्का जॉइंट डिफेंस एग्रीमेंट’?
इस सुरक्षा समझौते में फिलहाल सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान प्रमुख देश बताए जा रहे हैं। इन देशों की अलग-अलग रणनीतिक क्षमताएं हैं—सऊदी अरब आर्थिक ताकत, तुर्किये सैन्य तकनीक और ड्रोन क्षमता, जबकि पाकिस्तान के पास बड़ी सैन्य शक्ति और परमाणु हथियार हैं।
समझौते की सबसे महत्वपूर्ण व्यवस्था सामूहिक सुरक्षा से जुड़ी बताई जा रही है। इसके तहत अगर किसी एक सदस्य देश पर सशस्त्र हमला होता है तो उसे सभी सदस्य देशों पर हमला माना जाएगा। इसी प्रावधान की वजह से इसकी तुलना NATO के आर्टिकल-5 से की जा रही है।
हालांकि विशेषज्ञों के मुताबिक, इसे फिलहाल NATO कहना जल्दबाजी होगी। NATO के पास एकीकृत कमांड स्ट्रक्चर, सैन्य व्यवस्था और व्यापक संस्थागत ढांचा है, जबकि इस समझौते में ऐसी व्यवस्थाएं अभी पूरी तरह विकसित नहीं हैं।
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ पहले कह चुके हैं कि इस समझौते को भविष्य में एक ‘एक्सक्लूसिव क्लब’ तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए और इसे आगे चलकर व्यापक ‘इस्लामिक NATO’ का रूप दिया जा सकता है।
मिडिल ईस्ट का बढ़ता तनाव बना वजह?
इस गठबंधन के पीछे मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और ईरान की सैन्य गतिविधियों को प्रमुख कारणों में गिना जा रहा है। अमेरिका और इजरायल के साथ ईरान के तनावपूर्ण संबंधों ने सऊदी अरब की सुरक्षा चिंताओं को और बढ़ाया है।
बांग्लादेश की क्यों बढ़ी दिलचस्पी?
ढाका ने अभी औपचारिक रूप से इस समझौते में शामिल होने की घोषणा नहीं की है, लेकिन उसकी संभावित दिलचस्पी के पीछे कई रणनीतिक और आर्थिक कारण बताए जा रहे हैं।
1. सऊदी अरब से आर्थिक संबंध:
सऊदी अरब बांग्लादेश के लिए प्रवासी श्रमिकों की कमाई का एक बड़ा स्रोत है। वित्त वर्ष 2025-26 के पहले 11 महीनों में सऊदी अरब से बांग्लादेश को करीब 5.28 अरब डॉलर प्राप्त हुए। इससे दोनों देशों के आर्थिक संबंधों की अहमियत का अंदाजा लगाया जा सकता है।
2. ऊर्जा सुरक्षा:
बांग्लादेश आयातित तेल और LNG पर काफी निर्भर है। मध्य पूर्व से ऊर्जा आपूर्ति के लिए उसे रेड सी और बाब अल-मंदेब जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों का इस्तेमाल करना पड़ता है। ऐसे में ढाका इन समुद्री मार्गों की सुरक्षा को लेकर रणनीतिक सहयोग चाहता है।
3. रक्षा सहयोग:
तुर्किये और पाकिस्तान पहले से बांग्लादेश को सैन्य उपकरण उपलब्ध कराते रहे हैं। नए सुरक्षा ढांचे से सैन्य तकनीक, संयुक्त उत्पादन और सैन्य अभ्यास में सहयोग के अवसर बढ़ सकते हैं।
4. निवेश की संभावना:
सऊदी अरब बांग्लादेश के बंदरगाह, बुनियादी ढांचे और नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्रों में निवेश में रुचि दिखा रहा है। रणनीतिक साझेदारी से इन निवेशों को और बढ़ावा मिल सकता है।
5. विदेश नीति में बदलाव:
बांग्लादेश की मौजूदा विदेश नीति में ‘बांग्लादेश फर्स्ट’ यानी राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देने की बात कही जा रही है। भारत के साथ सीमा, जल बंटवारे और पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के भारत में रहने जैसे मुद्दों पर तनाव के बीच ढाका अपनी सुरक्षा साझेदारियों में विविधता लाने की कोशिश कर सकता है।
बांग्लादेश के मंत्रियों के बयानों में भी अंतर
हुमायूं कबीर ने समझौते को लेकर अपेक्षाकृत सकारात्मक रुख दिखाया है, जबकि शमा उबैद इस्लाम ने संकेत दिया कि अंतिम फैसला पूरी तरह बांग्लादेश के राष्ट्रीय हित को ध्यान में रखकर लिया जाएगा।
विश्लेषकों के मुताबिक, ढाका की यह रणनीति एक तरह की कूटनीतिक संतुलन की कोशिश भी हो सकती है—एक तरफ नए सुरक्षा सहयोग में रुचि दिखाना और दूसरी तरफ भारत के साथ संबंधों को पूरी तरह प्रभावित होने से बचाना।
बांग्लादेश शामिल हुआ तो भारत पर क्या असर पड़ेगा?
बांग्लादेश मामलों के जानकार और NEHU के प्रोफेसर डॉ. प्रसेनजीत बिस्वास के मुताबिक, बांग्लादेश के शामिल होने से तत्काल कोई सैन्य खतरा पैदा नहीं होगा, लेकिन भारत के लिए रणनीतिक चिंताएं जरूर बढ़ सकती हैं।
1. पाकिस्तान को मिल सकता है रणनीतिक फायदा
बांग्लादेश के इस सुरक्षा ढांचे में शामिल होने से पाकिस्तान को दक्षिण एशिया में अपना कूटनीतिक और रणनीतिक प्रभाव बढ़ाने का मौका मिल सकता है। भारत की सीमा से लगे एक और देश के साथ पाकिस्तान के रक्षा संबंध मजबूत होना नई सुरक्षा गणनाओं को जन्म दे सकता है।
2. भारत की पूर्वी सुरक्षा रणनीति पर असर
भारत को पश्चिमी मोर्चे पर पाकिस्तान से सुरक्षा चुनौती का सामना करना पड़ता है। ऐसे में अगर बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच खुफिया जानकारी साझा करने, संयुक्त सैन्य अभ्यास और रक्षा सहयोग में बढ़ोतरी होती है, तो भारत की पूर्वी सुरक्षा रणनीति अधिक जटिल हो सकती है।
3. बंगाल की खाड़ी में बदल सकता है समीकरण
बांग्लादेश की संभावित एंट्री से बंगाल की खाड़ी की सुरक्षा गतिशीलता भी प्रभावित हो सकती है। इससे भारत की पूर्वी समुद्री रणनीति के सामने नई चुनौतियां पैदा होने के साथ ही तुर्किये और पाकिस्तान के क्षेत्रीय प्रभाव को बढ़ावा मिल सकता है।
हालांकि, डॉ. प्रसेनजीत बिस्वास के मुताबिक, बांग्लादेश का इस ढांचे में शामिल होना अपने आप में उसे भारत-विरोधी सैन्य गठबंधन का हिस्सा नहीं बनाता। इसे फिलहाल एक उभरते हुए रणनीतिक ढांचे के तौर पर देखना ज्यादा उचित होगा।
भारत के सामने क्या विकल्प?
अगर बांग्लादेश इस सुरक्षा ढांचे में शामिल होता है तो भारत के लिए अपनी पूर्वी सीमा और बंगाल की खाड़ी में रणनीतिक गतिविधियों पर नजर रखना अहम होगा। साथ ही, भारत-बांग्लादेश के बीच सीमा, जल बंटवारे और व्यापार जैसे पुराने मुद्दों को सुलझाने की कोशिशों को तेज करना भी महत्वपूर्ण हो सकता है।
क्या ईरान भी शामिल हो सकता है?
इस बीच ईरान के संभावित रूप से इस सुरक्षा ढांचे में शामिल होने की चर्चा भी सामने आई है। ईरानी संसद की आधिकारिक समाचार एजेंसी ‘खानेह मेल्लत’ के प्रमुख मेहदी रहीमी ने लेबनानी चैनल ‘अल-मयादीन’ को बताया कि तेहरान को इस संबंध में निमंत्रण मिला है और मामले की समीक्षा की जा रही है।
रहीमी ने इसे ईरान के लिए एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक अवसर बताया। हालांकि, सऊदी अरब, तुर्किये और पाकिस्तान या ईरान के विदेश मंत्रालय की ओर से इस निमंत्रण की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।
ऐसे में बांग्लादेश और ईरान की संभावित भागीदारी इस उभरते सुरक्षा ढांचे का भविष्य तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
