भारत में इस साल जून महीने में पिछले एक दशक से भी अधिक समय की सबसे कम बारिश दर्ज की गई है, जिससे देश के कृषि क्षेत्र में गंभीर चिंता पैदा हो गई है। कमजोर मानसून की शुरुआत ने खरीफ फसलों की बुवाई को प्रभावित किया है और करोड़ों किसानों के सामने अनिश्चितता की स्थिति खड़ी कर दी है। धान, मक्का, कपास, सोयाबीन, दलहन और तिलहन जैसी प्रमुख फसलों की खेती पूरी तरह मानसून पर निर्भर करती है, ऐसे में बारिश की कमी का सीधा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर देखने को मिल रहा है।
जून का महीना भारतीय कृषि के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि इसी समय दक्षिण-पश्चिम मानसून देश में प्रवेश करता है और खेती की शुरुआत होती है। किसान इस समय खेतों की तैयारी करते हैं, बीज खरीदते हैं और बुवाई शुरू करते हैं। लेकिन इस वर्ष कई राज्यों में बारिश की भारी कमी के कारण खेत सूखे पड़े हैं और बुवाई का काम या तो टल गया है या बहुत धीमी गति से चल रहा है।
कई किसान पहले ही बीज, खाद, डीजल और श्रम पर पैसा खर्च कर चुके हैं, लेकिन पर्याप्त बारिश न होने के कारण यह निवेश अभी तक उपयोग में नहीं आ पाया है। जिन किसानों ने समय से पहले बुवाई कर दी थी, उन्हें अब बीज अंकुरण की समस्या का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में उन्हें दोबारा बुवाई करनी पड़ सकती है, जिससे उनकी लागत और बढ़ जाएगी और आर्थिक दबाव भी बढ़ेगा।
छोटे और सीमांत किसान इस स्थिति से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं। इन किसानों के पास सीमित संसाधन होते हैं और वे अधिकतर अपनी सालाना आय के लिए खरीफ फसल पर निर्भर रहते हैं। बारिश में देरी या कमी उनके लिए कर्ज बढ़ने और आय घटने का कारण बन सकती है। ग्रामीण मजदूरों पर भी इसका असर पड़ रहा है क्योंकि बुवाई के काम में कमी आने से रोजगार के अवसर घट जाते हैं।
सूखे जैसे हालात का असर केवल खेती तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह ग्रामीण जीवन के अन्य क्षेत्रों को भी प्रभावित करता है। तालाब, कुएं, नदियाँ और भूजल स्तर बारिश की कमी के कारण पर्याप्त रूप से नहीं भर पा रहे हैं। इससे सिंचाई की समस्या बढ़ सकती है, खासकर उन क्षेत्रों में जहाँ किसान पूरी तरह भूजल पर निर्भर हैं।
पशुपालन करने वाले किसानों के लिए भी यह स्थिति चुनौतीपूर्ण है क्योंकि हरे चारे और पानी की कमी से पशुओं का पालन कठिन हो जाता है। इससे दूध उत्पादन और अन्य पशु उत्पादों पर भी असर पड़ सकता है।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि बारिश की स्थिति जल्द नहीं सुधरी तो इसका असर देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। फसलों का उत्पादन कम होने से बाजार में खाद्य वस्तुओं की आपूर्ति घट सकती है और कीमतें बढ़ सकती हैं। इससे महंगाई में बढ़ोतरी हो सकती है, जिसका असर आम जनता पर पड़ेगा।
सरकार और कृषि विभाग स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं और किसानों को सलाह दी जा रही है कि वे सूखा सहन करने वाली फसलों का चयन करें, जल संरक्षण तकनीकों का उपयोग करें और मौसम के अनुसार अपनी बुवाई की योजना में बदलाव करें। कई राज्यों में किसानों के लिए आपातकालीन बीज भंडार भी तैयार किए गए हैं ताकि जरूरत पड़ने पर सहायता दी जा सके।
मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी मानसून का पूरा सीजन बाकी है और जुलाई व अगस्त में बारिश की स्थिति सुधर सकती है। यदि बारिश सामान्य हो जाती है तो खरीफ फसलों की बुवाई में तेजी आ सकती है और नुकसान को कुछ हद तक कम किया जा सकता है।
हालांकि, बदलते जलवायु पैटर्न के कारण मौसम अब पहले जैसा स्थिर नहीं रहा है। कभी लंबे समय तक सूखा, तो कभी अचानक भारी बारिश—इस असंतुलन ने खेती को और अधिक जोखिमपूर्ण बना दिया है। इसलिए कृषि में आधुनिक तकनीक, बेहतर सिंचाई व्यवस्था और जल संरक्षण को अपनाना अब पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गया है।
कुल मिलाकर, इस साल का कमजोर मानसून भारतीय कृषि के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है। आने वाले हफ्ते तय करेंगे कि किसानों की मेहनत सफल होगी या मौसम की मार से उन्हें नुकसान उठाना पड़ेगा।
