नई दिल्ली: देशभर के सरकारी विभागों, स्कूलों और अस्पतालों में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि ऐसे कर्मचारी लेबर एक्ट के दायरे में बने रहेंगे। 9 जजों की संविधान पीठ के फैसले में 6 जजों ने बहुमत के आधार पर इस मामले में महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है।
1978 के फैसले का ट्रिपल टेस्ट बरकरार
सुप्रीम कोर्ट ने उद्योग की पहचान के लिए 1978 में दिए गए फैसले में तय किए गए ‘ट्रिपल टेस्ट’ को बरकरार रखा है। कोर्ट ने माना कि यह टेस्ट समय की कसौटी पर खरा उतरा है, हालांकि इसके कुछ हिस्सों को और स्पष्ट किए जाने की जरूरत है।
संविधान पीठ के विस्तृत फैसले में ट्रिपल टेस्ट को नए तरीके से समझाया गया है, जिससे यह तय करने में मदद मिलेगी कि किसी संस्थान या गतिविधि को ‘उद्योग’ की श्रेणी में रखा जा सकता है या नहीं।
पुराने मामलों पर भी सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जिन मामलों में अंतिम फैसला हो चुका है, उन्हें दोबारा नहीं खोला जाएगा। वहीं, जो मामले अभी Industrial Disputes Act के तहत अदालत, ट्रिब्यूनल या Labour Authority के सामने लंबित हैं, उनका फैसला 1978 के फैसले में निर्धारित सिद्धांतों के आधार पर किया जा सकता है।
क्या था 1978 का फैसला?
1978 में सुप्रीम कोर्ट ने ‘उद्योग’ की ऐसी व्यापक परिभाषा तय की थी, जिसके दायरे में स्कूल, अस्पताल और सरकारी विभागों सहित कई संस्थान आ गए थे। उस फैसले के मुताबिक, जहां नियोक्ता और कर्मचारी के बीच संबंध है और निर्धारित गतिविधियां होती हैं, वहां संस्था को ‘उद्योग’ की श्रेणी में रखा जा सकता है।
इस व्यवस्था का असर ऐसे कर्मचारियों पर भी पड़ा, जो उन संस्थानों में काम करते हैं जहां पारंपरिक अर्थों में किसी वस्तु का उत्पादन नहीं होता।
कई राज्य सरकारों ने फैसले में बदलाव की मांग की थी
1978 के फैसले के बाद सरकारी विभागों, स्कूलों और अस्पतालों समेत कई संस्थानों में काम करने वाले कर्मचारियों को श्रम कानूनों के तहत अधिकार मिलने लगे। हालांकि, कई राज्य सरकारों और सरकारी विभागों ने सुप्रीम कोर्ट से इस व्यवस्था में बदलाव की मांग की थी।
अब सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से सरकारी विभागों, स्कूलों और अस्पतालों में काम करने वाले कर्मचारियों के अधिकारों और लंबित श्रम विवादों को लेकर स्थिति काफी हद तक स्पष्ट हो गई है।
