नई दिल्ली: भारत में लंबे समय से बच्चों की शिक्षा को सबसे बड़ा निवेश माना जाता रहा है। अधिकांश परिवार अपनी दूसरी जरूरतों में कटौती कर सकते हैं, लेकिन बच्चों की पढ़ाई पर समझौता नहीं करना चाहते। हालांकि, बदलते समय के साथ शिक्षा का खर्च तेजी से बढ़ा है। अब केवल स्कूल फीस ही नहीं, बल्कि ट्यूशन, कोचिंग, ट्रांसपोर्ट, यूनिफॉर्म, किताबें, डिजिटल डिवाइस, ऑनलाइन लर्निंग, एक्स्ट्रा करिकुलर गतिविधियां और कॉलेज फीस भी परिवारों के बजट पर बड़ा असर डाल रही हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते वित्तीय योजना नहीं बनाई गई, तो भविष्य में बच्चों की उच्च शिक्षा का खर्च कई परिवारों के लिए बड़ी आर्थिक चुनौती बन सकता है।
सरकारी और निजी स्कूलों के खर्च में बड़ा अंतर
सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय की Comprehensive Modular Survey on Education 2025 के अनुसार:
- सरकारी स्कूल में प्रति छात्र परिवार का औसत वार्षिक खर्च करीब ₹2,863 है।
- वहीं निजी स्कूलों में यही खर्च बढ़कर करीब ₹25,002 प्रति वर्ष तक पहुंच जाता है।
रिपोर्ट में बताया गया है कि स्कूल फीस के अलावा किताबें, स्टेशनरी, यूनिफॉर्म और परिवहन पर भी परिवारों को अच्छी-खासी राशि खर्च करनी पड़ती है। साथ ही, शहरी क्षेत्रों में रहने वाले परिवार ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शिक्षा पर अधिक खर्च कर रहे हैं।
कोचिंग का बढ़ता चलन बढ़ा रहा खर्च
आज के समय में स्कूल की पढ़ाई के साथ निजी कोचिंग भी लगभग आवश्यकता बन चुकी है।
सर्वे के अनुसार:
- चार में से एक से अधिक छात्र स्कूल के अलावा अलग से कोचिंग ले रहे हैं।
- हायर सेकेंडरी स्तर पर शहरी परिवार एक छात्र की कोचिंग पर औसतन ₹9,950 प्रति वर्ष खर्च कर रहे हैं।
- वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में यह औसत खर्च करीब ₹4,548 प्रति वर्ष है।
चूंकि अधिकांश छात्र अपनी पढ़ाई के लिए परिवार पर निर्भर रहते हैं, इसलिए शिक्षा का बढ़ता खर्च सीधे घरेलू बजट को प्रभावित कर रहा है।
फीस के अलावा कई छिपे हुए खर्च
विशेषज्ञों के अनुसार शिक्षा की वास्तविक लागत केवल स्कूल फीस तक सीमित नहीं है।
परिवारों को समय-समय पर इन मदों पर भी खर्च करना पड़ता है:
- डेवलपमेंट फीस
- स्पोर्ट्स और अन्य गतिविधियों की फीस
- यूनिफॉर्म और स्टेशनरी
- लैपटॉप, टैबलेट और इंटरनेट
- ऑनलाइन लर्निंग प्लेटफॉर्म
- स्किल डेवलपमेंट और प्रोफेशनल कोर्स
- प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी
बदलती तकनीक और रोजगार की मांग को देखते हुए इन खर्चों को अब वैकल्पिक नहीं, बल्कि आवश्यक माना जा रहा है।
शिक्षा की महंगाई सामान्य महंगाई से अलग
शिक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि कई अभिभावक यह मानकर चलते हैं कि शिक्षा का खर्च सामान्य महंगाई दर के अनुसार बढ़ेगा, जबकि वास्तविकता इससे अलग है।
उनके अनुसार, ट्यूशन फीस, कोचिंग, हॉस्टल, ट्रांसपोर्ट, डिजिटल उपकरण और प्रोफेशनल कोर्स की लागत सामान्य महंगाई की तुलना में कहीं अधिक तेजी से बढ़ सकती है।
उदाहरण के तौर पर, यदि किसी प्रोफेशनल कोर्स की मौजूदा लागत 20 लाख रुपये है, तो आने वाले वर्षों में शिक्षा महंगाई के कारण इसकी फीस कई गुना तक बढ़ सकती है।
विशेषज्ञों की सलाह
विशेषज्ञों का मानना है कि बच्चों की शिक्षा के लिए जल्दी वित्तीय योजना बनाना, नियमित बचत करना और लंबी अवधि के निवेश पर ध्यान देना भविष्य के आर्थिक दबाव को कम करने में मदद कर सकता है।
