प्राइवेट अस्पतालों के बढ़ते खर्च पर उठे सवाल, सर्वे में?

प्राइवेट अस्पतालों के बढ़ते खर्च पर उठे सवाल, सर्वे में?

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नई दिल्ली: भारत में स्वास्थ्य सुविधाओं का लगातार विस्तार हो रहा है, लेकिन बेहतर इलाज के साथ बढ़ता मेडिकल खर्च आम लोगों के लिए बड़ी चिंता बनता जा रहा है। खासतौर पर प्राइवेट अस्पतालों में इलाज की लागत को लेकर मरीजों और उनके परिवारों की शिकायतें सामने आती रही हैं। हाल ही में सामने आए एक सर्वे में भी बड़ी संख्या में लोगों ने प्राइवेट अस्पतालों के बिल, इलाज के तरीके और जरूरत से ज्यादा टेस्ट कराए जाने को लेकर सवाल उठाए हैं।

सरकारी और प्राइवेट अस्पताल के खर्च में बड़ा अंतर

नेशनल सैंपल सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक, एक बीमारी के इलाज पर सरकारी अस्पताल में औसतन करीब 6,631 रुपये खर्च होते हैं, जबकि प्राइवेट अस्पताल में यही खर्च बढ़कर करीब 50,508 रुपये तक पहुंच जाता है। यानी एक ही बीमारी के इलाज में सरकारी अस्पताल की तुलना में प्राइवेट अस्पताल का खर्च कई गुना अधिक हो सकता है।

गंभीर बीमारियों के मामले में यह अंतर और बढ़ जाता है। कैंसर, हृदय रोग और किडनी से जुड़ी बीमारियों के इलाज में प्राइवेट अस्पतालों का बिल लाखों रुपये तक पहुंच सकता है। ऐसे में मध्यम वर्ग और सीमित आय वाले परिवारों के लिए इलाज का खर्च बड़ी आर्थिक चुनौती बन जाता है।

जरूरत से ज्यादा टेस्ट कराने का भी आरोप

सर्वे में शामिल लोगों की एक प्रमुख शिकायत यह रही कि कुछ मामलों में प्राइवेट अस्पतालों में मरीजों से जरूरत से ज्यादा जांच कराने के लिए कहा जाता है। लोगों का आरोप है कि बीमारी को लेकर चिंता के बीच मरीज और परिवार डॉक्टरों की सलाह पर भरोसा करते हैं और कई बार उन्हें यह स्पष्ट जानकारी नहीं मिल पाती कि कौन-सा टेस्ट क्यों कराया जा रहा है।

ऐसे में जांच और इलाज का खर्च लगातार बढ़ता जाता है। मरीजों के परिवारों की मांग है कि अस्पतालों की ओर से हर जांच और प्रक्रिया की वजह तथा उसकी लागत स्पष्ट रूप से बताई जानी चाहिए।

दवाइयों और बिल को लेकर भी शिकायत

इलाज के बाद मिलने वाली दवाइयों को लेकर भी कुछ मरीजों ने सवाल उठाए हैं। लोगों का कहना है कि कई बार उन्हें ऐसी दवाइयां भी लिखी जाती हैं, जिनकी जरूरत को लेकर उन्हें पर्याप्त जानकारी नहीं दी जाती।

वहीं, अस्पताल के बिल में अलग-अलग जांच, दवाइयों, प्रक्रियाओं और अन्य शुल्क की जानकारी स्पष्ट नहीं होने की शिकायत भी सामने आती है। इससे मरीज के परिवार के लिए यह समझना मुश्किल हो जाता है कि कुल रकम किस-किस मद में खर्च हुई।

बीमा होने के बावजूद जेब से खर्च

सर्वे के मुताबिक, 68 फीसदी लोगों ने प्राइवेट अस्पतालों को लेकर किसी न किसी तरह की चिंता या शिकायत जताई। इनमें बीमा से जुड़े मामले भी शामिल हैं।

कुछ लोगों का कहना है कि स्वास्थ्य बीमा होने के बावजूद कई बार पूरा खर्च बीमा के तहत कवर नहीं हो पाता। ऐसे में मरीज के परिवार को अपनी जेब से भी बड़ी रकम खर्च करनी पड़ती है। खासतौर पर लंबी और गंभीर बीमारी के दौरान यह आर्थिक बोझ काफी बढ़ सकता है।

सरकारी अस्पतालों पर क्यों बढ़ता है भरोसा?

सरकारी अस्पतालों में इलाज की लागत अपेक्षाकृत कम होने के साथ-साथ कई सरकारी योजनाओं के तहत पात्र मरीजों को मुफ्त या रियायती इलाज की सुविधा भी मिलती है। हालांकि, बड़ी संख्या में लोग बेहतर सुविधाओं, कम प्रतीक्षा समय और निजी स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता के कारण प्राइवेट अस्पतालों का विकल्प चुनते हैं।

स्वास्थ्य क्षेत्र में बढ़ते खर्च के बीच विशेषज्ञों और मरीजों की ओर से अस्पतालों में पारदर्शी बिलिंग, जांच की स्पष्ट जानकारी और इलाज की लागत पहले से बताने जैसी व्यवस्थाओं की जरूरत पर जोर दिया जाता रहा है।

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