मुस्लिम पुरुषों के बहुविवाह पर सुप्रीम कोर्ट का केंद्र को नोटिस

मुस्लिम पुरुषों के बहुविवाह पर सुप्रीम कोर्ट का केंद्र को नोटिस

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नई दिल्ली: मुस्लिम पुरुषों को एक से अधिक विवाह की अनुमति देने वाले प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है। याचिका में पहली पत्नी के रहते दूसरी शादी को शून्य घोषित करने और उसे दंडनीय अपराध बनाने की मांग की गई है। इसके साथ ही विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और भरण-पोषण जैसे मामलों में जेंडर न्यूट्रल कानून बनाने की भी मांग उठाई गई है।

सुप्रीम कोर्ट ने मांगा केंद्र का जवाब

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने इस मामले में केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है। याचिका महिला अधिकार कार्यकर्ताओं ज़किया सोमन, डॉ. नूरजहाँ सफिया नियाज़, जावेद आनंद, शमसुद्दीन मोहिद्दीन तांबोली और बदर सईद द्वारा दायर की गई है।

शरीअत एक्ट की धारा 2 को दी चुनौती

याचिकाकर्ताओं ने मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीअत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 की धारा 2 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है। यह प्रावधान विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, भरण-पोषण और वक्फ जैसे मामलों में मुस्लिम पर्सनल लॉ लागू करने का आधार बनता है।

याचिका में कहा गया है कि भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की धारा 82 के तहत बहुविवाह अपराध है, इसलिए मुस्लिम पुरुषों को चार विवाह की अनुमति देना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), 15 (भेदभाव पर रोक) और 21 (गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार) का उल्लंघन है।

बहुविवाह को धार्मिक स्वतंत्रता का हिस्सा नहीं बताया

याचिका में ‘खुर्शीद अहमद खान बनाम उत्तर प्रदेश’ मामले का हवाला देते हुए कहा गया है कि बहुविवाह इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है और इसे संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षण नहीं मिल सकता।

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि कुरान में बहुविवाह की अनुमति विशेष ऐतिहासिक परिस्थितियों में विधवाओं और अनाथों की सुरक्षा के लिए दी गई थी, लेकिन इसके साथ सभी पत्नियों और बच्चों के साथ समान न्याय की शर्त भी रखी गई थी, जिसे व्यवहार में निभाना संभव नहीं है। याचिका में तुर्की, ट्यूनीशिया, मोरक्को और मिस्र जैसे देशों का भी उल्लेख किया गया है, जहां बहुविवाह पर प्रतिबंध या कड़े नियंत्रण हैं।

BMMA सर्वे का हवाला

याचिका में भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन (BMMA) के वर्ष 2025 के सर्वे का भी उल्लेख किया गया है। 2,500 मुस्लिम महिलाओं पर आधारित इस सर्वे के अनुसार:

  • 88% दूसरे विवाह पहली पत्नी की सहमति के बिना हुए।
  • 54% मामलों में पहली पत्नी को छोड़ दिया गया।
  • 85% महिलाओं ने बहुविवाह पर पूर्ण कानूनी प्रतिबंध की मांग की।

याचिका में क्या-क्या मांगें?

याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि:

  • बहुविवाह को असंवैधानिक घोषित किया जाए।
  • पहली पत्नी के रहते दूसरी शादी को अपराध माना जाए।
  • BNS की धारा 82 सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू की जाए।
  • विवाह और तलाक का पंजीकरण अनिवार्य किया जाए।
  • न्यायसंगत और जेंडर-न्यूट्रल मुस्लिम पर्सनल लॉ तैयार करने के लिए केंद्र सरकार को निर्देश दिए जाएं।

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है। मामले की अगली सुनवाई केंद्र के जवाब के बाद होगी।

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