कैंसर की पहचान अब सिर्फ सांस से? भारतीय स्टार्टअप की नई तकनीक 

कैंसर की पहचान अब सिर्फ सांस से? भारतीय स्टार्टअप की नई तकनीक 

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बेंगलुरु: बेंगलुरु स्थित डीप-टेक स्टार्टअप डॉग्नोसिस (Dognosis) एक ऐसी नई कैंसर स्क्रीनिंग तकनीक विकसित कर रही है, जो भविष्य में स्वास्थ्य जांच के तरीके को बदल सकती है। कंपनी का ‘BreathEasy’ प्लेटफॉर्म कुत्तों की सूंघने की क्षमता और ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस (Brain-Computer Interface) तकनीक का उपयोग करके कैंसर के संभावित जोखिम की शुरुआती पहचान करने के लिए तैयार किया जा रहा है।

कंपनी के अनुसार, यदि मौजूदा क्लिनिकल ट्रायल सफल रहते हैं, तो इस तकनीक को 2027 की शुरुआत में भारत में व्यावसायिक रूप से लॉन्च करने की योजना है।

कैसे काम करेगी यह तकनीक?

BreathEasy में किसी ब्लड टेस्ट या स्कैन की आवश्यकता नहीं होगी। व्यक्ति को लगभग 10 मिनट तक एक विशेष मास्क में सांस लेनी होगी। इसके बाद सांस के नमूने का विश्लेषण किया जाएगा।

कंपनी का कहना है कि शरीर में कैंसर कोशिकाओं के विकसित होने पर वोलेटाइल ऑर्गेनिक कंपाउंड्स (VOCs) नामक सूक्ष्म रासायनिक अणु सांस के माध्यम से बाहर निकलते हैं। कुत्तों की सूंघने की क्षमता इन संकेतों को पहचान सकती है।

डॉग्नोसिस मुख्य रूप से बीगल नस्ल के प्रशिक्षित कुत्तों का उपयोग कर रही है। साथ ही, कंपनी ने एक विशेष ब्रेन-कंप्यूटर इंटरफेस विकसित किया है, जो नमूने को सूंघते समय कुत्ते के मस्तिष्क की गतिविधि रिकॉर्ड और विश्लेषित करता है, जिससे केवल व्यवहार आधारित संकेतों पर निर्भरता कम हो जाती है।

एक बार में 200 से अधिक नमूनों की जांच का दावा

कंपनी के अनुसार, उसका स्वचालित प्लेटफॉर्म एक सत्र में 200 से अधिक सांस के नमूनों की जांच बिना मानवीय हस्तक्षेप के कर सकता है। भविष्य में कई यूनिट्स के जरिए हर वर्ष करीब 10 लाख नमूनों की जांच करने का लक्ष्य रखा गया है।

सांस के नमूने अस्पतालों, डायग्नोस्टिक लैब और अन्य स्वास्थ्य केंद्रों से एकत्र कर जांच केंद्रों तक भेजे जा सकेंगे।

अभी क्लिनिकल ट्रायल जारी

BreathEasy फिलहाल बड़े पैमाने पर क्लिनिकल परीक्षण से गुजर रहा है। इन परीक्षणों का उद्देश्य यह पता लगाना है कि वास्तविक परिस्थितियों में यह तकनीक कितनी सटीक और भरोसेमंद साबित होती है।

हाल ही में जर्नल ऑफ क्लिनिकल ऑन्कोलॉजी में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, जिन प्रतिभागियों को कैंसर नहीं था, उनमें से लगभग 9 प्रतिशत को गलत तरीके से पॉजिटिव बताया गया, जबकि लगभग 9 प्रतिशत कैंसर मरीजों की पहचान नहीं हो सकी।

हालांकि, कंपनी का कहना है कि यह अध्ययन तकनीक की वैज्ञानिक क्षमता को परखने के लिए किया गया था और इसके परिणामों को सीधे आम आबादी पर लागू नहीं किया जा सकता।

इलाज नहीं, शुरुआती स्क्रीनिंग का माध्यम

डॉग्नोसिस ने स्पष्ट किया है कि BreathEasy कैंसर का अंतिम निदान (Diagnosis) नहीं करेगा, बल्कि यह एक रिस्क स्क्रीनिंग टूल के रूप में काम करेगा। इसका उद्देश्य केवल उन लोगों की पहचान करना है, जिनमें कैंसर होने का जोखिम अधिक हो सकता है। ऐसे लोगों को आगे ब्लड टेस्ट, इमेजिंग या बायोप्सी जैसी पारंपरिक जांच कराने की सलाह दी जाएगी।

स्वतंत्र विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक संभावनाओं से भरपूर है, लेकिन इसे स्वास्थ्य सेवाओं में व्यापक रूप से अपनाने से पहले बड़े पैमाने पर क्लिनिकल प्रमाण और दीर्घकालिक विश्वसनीयता साबित होना आवश्यक है।

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